Tuesday, April 30, 2013

कभी मुंतज़िर चश्में......


कभी मुंतज़िर चश्में
ज़िगर हमराज़ था,
कभी बेखबर कभी
पुरज़ुनू ये मिजाज़ था,
कभी गुफ़्तगू  के हज़ूम तो, कभी
खौफ़-ए-ज़द
कभी बेज़ुबां,
कभी जीत की आमद में मैं,
कभी हार से मैं पस्त था.
कभी शौख -ए-फ़ितरत का नशा, 
कभी शाम- ए-ज़श्न  ख़ुमार था ,
कभी था हवा का ग़ुबार तो
कभी हौसलों का पहाड़ था.
कभी ज़ुल्मतों के शिक़स्त में 
ख़ामोशियों का शिकार था,
कभी थी ख़लिश कभी रहमतें 
कभी हमसफ़र का क़रार था.
कभी चश्म-ए-तर की गिरफ़्त में
सरगोशियों का मलाल था,
कभी लम्हा-ए-नायाब में
मैं  भर रहा परवाज़ था.
कभी  था उसूलों से घिरा
मैं रिवायतों के अजाब में,
कभी था मज़ा कभी बेमज़ा 
सूद-ओ- जिया के हिसाब में.
मैं था बुलंदी पर कभी 
छूकर ज़मीं जीता रहा,
कभी ये रहा,कभी वो रहा 
और जिंदगी चलती रही ......... 
 
  
 

Wednesday, March 20, 2013

नीम के पत्ते यहाँ ........

नीम के पत्ते यहाँ
दिन-रात 
गिरकर,
चैत के आने का हैं 
आह्वान करते,
रात छोटी,दोपहर 
लम्बी ज़रा 
होने लगी है।
पेड़ से इतने गिरे 
पत्ते 
कि  दुबला हो गया है 
नीम 
जो पहले घना था,
टहनियों के बीच से 
दिखने लगा आकाश,    
दुबला हो गया है नीम 
जो पहले घना था।
क्यारियों से फूल पीले 
अब विदा 
होने लगे हैं 
और गुलमोहर पे पत्ते 
अब सुनो,
लगने लगे हैं,
शीत जो लगभग गया था,
मुड़ के वापस 
आ गया है,
विदा का फिर 
स्नेहमय 
स्पर्श देने 
आ गया है।
इन दिनों चिड़ियों का आना 
बढ़ गया है,
घोंसले बनने लगे हैं,
घास, तिनके चोंच में 
दिखने लगे हैं।
पेड़ की हर डाल पर 
लगता कोई मेला 
कि किलकारी यहाँ 
पड़ती सुनायी,
घास पर लगता कि 
पत्तों की कोई 
चादर बिछायी।
हवा में फैली 
मधुर,मीठी,वसंती 
महक 
अब, जाने लगी है,
चैत की चंचल हवा में
चपलता
चलने लगी है।
सूर्य की किरणें
सुबह
जल्दी ज़रा आने लगी हैं,
धूप  की नरमी पे
गर्मी का दखल
बढ़ने लगा है।
शाम होती देर से
कि दोपहर
लम्बी ज़रा होने लगी है ,
रात में कुछ देर तक
अब
चाँद भी रहने लगा है।

Tuesday, February 26, 2013

चाय......

आज सुबह में 
चाय नहीं 
कुछ ठीक बनी थी, 
दूध ज़रा ज्यादा था 
या 
कि चीनी खूब पड़ी थी 
या फिर शायद 
उलझन कोई 
मन में हुई 
खड़ी थी, 
आज सुबह में 
चाय नहीं 
कुछ ठीक बनी थी. 
चाय की पत्ती 
कम थी 
या 
कि रंग नहीं आया था 
या फिर शायद 
नींद लगी थी 
मन कुछ अलसाया था, 
आज सुबह में 
चाय नहीं 
कुछ ठीक बनी थी.

Tuesday, February 12, 2013

सूरज की पहली किरण से........


सूरज की पहली किरण से
नहाकर तुम 
और 
गूँथकर चाँदनी को 
अपने
 बालों में ,मैं 
चलो स्वागत करें ,
ऋतु-वसंत का .......
आसमान की भुजाओं में 
थमा दें ,
पराग की झोली 
और 
दूर-दूर तक उड़ायें ,
मौसम का गुलाल.
रच लें 
हथेलियों पर ,
केशर की पंखुड़ियाँ,
बांध लें 
सांसों में,जवाकुसुम की 
मिठास ,सजा लें 
सपनों में 
गुलमोहर के चटकीले 
रंग ,
बिखेर लें कल्पनाओं में,
जूही की कलियाँ ......कि
 ऋतु-वसंत है .......
सूरज की पहली किरण से 
नहाकर तुम 
और 
गूँथकर चाँदनी को 
अपने 
बालों में, मैं 
चलो स्वागत करें.
हवाओं के आँचल पर 
खोल दें
ख्वाबों के पर ,
तरु-दल के स्पंदन से 
आकांछाओं के
जाल बुनें ,
झूम आयें गुलाब के 
गुच्छों पर,
नर्म पत्तों की 
महक से चलो, कुछ 
बात करें.
आसमानी उजालों में 
सोने की धूप 
छुयें,
मकरंद के पंखों से,
कलियों को 
जगायें....कि
ऋतु-वसंत है.......
सूरज की पहली किरण से 
नहाकर तुम 
और 
गूँथकर चाँदनी को 
अपने 
बालों में, मैं 
चलो स्वागत करें.
  

Monday, February 4, 2013

ऋतुराज वसंत की गलियन में .........

यह कविता लगभग पच्चीस-तीस साल पहले, अपनी बेटियों को जगाने के लिए लिखी थी, हर साल वसंत- ऋतु में ज़रूर मन में घूमने लगती है.......

ऋतुराज वसंत की गलियन में
कोयल  रस-कूक   सुनावत हैं,
अधरों  पर   राग-विहाग लिए
अमरावाली  में,  इठलावट   हैं.
मधु-मदिरा पी, भ्रमरों के दल
कलियों  पर  जा  मंडरावत हैं,
मणि-माल लिए रश्मि-रथ पर
अब   भानु उदय को  आवत हैं . 
लखि   शोभा ऐसी  नैनन   सों
मृदु मन सबके   पुलकावत हैं,
पनघट जागी, जागी  चिड़िया
मेरी      गुड़िया  भी  जागत हैं.

Saturday, January 19, 2013

छः वर्ष के बच्चे के .......हाथों से जब

                 

अपने ' nephew' के नाम.....जो विभिन्न उपलब्धियों को हासिल करते हुए , वाशिंगटन में 'World-bank' के एक
प्रतिष्ठित पद पर आसीन हैं . हाल ही में उनका एक भाषण सुनने को मिला.......          

Sanjay Pradhan: How open data is changing international aid
Sanjay Pradhan is vice president of the World Bank Institute, helping leaders in developing countries learn skills for reform, development and good governance.
यह उसी की प्रतिक्रिया है......काश! कुछ और लोग भी इस 'छोटी सी' पर 'बड़ी बात' से प्रेरणा ले पाते......



छः वर्ष के बच्चे के          
हाथों से जब,
एक पिता 
मिठाई,                          
आधी खाई हुई 
छीनकर,
दूर फेंक देता है,
रिश्वत के रस्ते आयी, 
ज़हरीली है,
ऐसा कुछ 
कह देता है.......
तब 
बाल-सुलभ ,कोमल-मन 
हतप्रभ,
बेहिसाब 
रोता है........पर 
उसी  सुदृढ़ सच्चाई की 
अनुपम मिसाल का 
बल लेकर, 
जीवन-क्रम में,
तुम जैसा बन 
नभ को छूता है.
                            

Monday, January 14, 2013

तुम्हारे साथ बीते वे पल ....

तुम्हारे साथ बीते वे पल ....
मैं कहती उन्हें
ठंढी हवा का
एक झोंका..अगर
जेठ की
दुपहरी होती
पर अगहन-पूस की
शाम में,
ठंढी हवा
शीत-लहरी होती है,
राहत  नहीं पहुँचाती
सूई सी
चुभोती है..इसीलिए
बदलनी होगी
पुरानी मान्यतायें,
पुरानी कल्पनायें
और
कहना होगा..
तुम्हारे साथ बीते वे पल.......
जैसे हल्की सी
आहट हो
गर्म-गर्म हवा की,
दिल-ओ-दिमाग को
सुकून सी पहुँचाती हो.