Wednesday, March 23, 2016

हम स्नेहक पात पर .......( मैथिली )

हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क            
आयल छी ,
चैत के चंचल हवा
आर
कुसुमी रंग
ल आयल छी .....
हम किरण असमान सँ
धरती सँ
दूभी -धान  लय
गीत सागर के लहर सँ
भ्रमर सँ
मधुपान लय......
खीच क मधु
यामिनी सँ , चाँदनी सँ
ज्योत्स्ना
झिलमिलाहट हम
तरेगन सँ उड़ा
ल आयल छी .......
हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क
आयल  छी .......
रंग गुलाल , अबीरक झोली
श्याम संग
कनुप्रिया के होली
खेलि रहलि छथि
बारि - दुआरि
हर्ष उमंगक
रस में घोली,
अनुपम छवि सँ
प्रीति माँगि कय
आज एतय
ल आयल छी ......
हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क
आयल  छी ........
फाग मचल , उमगल
अंगना - घर
धूम उठल रसिया के
रघुबर कर पिचकारी
भरल अछि
रंग सँ अंग सिया के.....
अद्भुद रूप छटा
सम्मोहन
वैह फुहार ल
आयल छी ......
हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क
आयल छी ......
चैत के चंचल हवा
आर
कुसुमी रंग
ल आयल छी......    

Friday, March 4, 2016

टेलीफोन विभाग ......

आज जब लोग इंटरनेट और मोबाईल से इतने बंधे हुये हैं कि इनकी रफ़्तार जरा सी भी धीमी हो जाये तो परेशान हो जाते हैं...... तब मुझे कलकत्ते का 1986 वाला समय बरबस ही याद आने लगता   है ......जब हम पूरी तरह से टेलीफोन पर ही निर्भर थे .....वो भी प्राइवेट कंपनीज की  नहीं , सिर्फ भारत सरकार के  टेलीफोन विभाग पर ......तो आज उसी समय की लिखी हुई और वहीँ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच पर सुनायी हुई  एक कविता आपको सुना रही हूँ...... ( खास बात ये कि  उस समय मेरे पति  चीफ जेनरल मैनेजर , ईस्टर्न टेलीकॉम  रिज़न थे )

टेलीफोन विभाग के 
वरिष्ठ अधिकारी के घर 
छह महीने 
दौड़ने के बाद 
एक साहब के घर 
फोन लग गया..... 
साहब हुये खुश 
उठाया चोंगा लगाया नंबर 
पर ये क्या ?
न डायल टोन , न आवाज़ 
ख़ामोशी का 
साम्राज्य.... 
साहब आ गये 
सकते में 
कैसा ये चक्कर 
पहुँच गये सर के बल 
अधिकारी के दफ्तर ...... 
कॉल-बेल दबाया तो 
पी. ए. बाहर आया 
नाम काम पूछकर 
अंदर पहुँचाया ..... 
अधिकारी ने कहा , बुलाओ 
पी. ए. ने कहा , आओ 
इस प्रकार साहब ने 
अंदर प्रवेश पाया.... 
अधिकारी ने पहचाना , कहा 
कैसे हुआ आना ?
साहब कुछ घबराये 
थोड़ा सकपकाये 
कई बार सर को 
इधर-उधर घुमाये 
फिर बड़ी विनम्रता से 
बोले शालीनता से -
सर , फोन तो लग गया 
पर..... 
डॉयल टोन नहीं आया .....
अधिकारी कुछ गम्भीर हुये 
बिना अधीर हुये 
मेज़ की दराज़ को खिसकाया 
लाइटर निकालकर 
सिगरेट को जलाया..... 
दो-चार लम्बे कश लेकर 
पेशानी पर कुछ 
बल देकर 
थोड़ा गरमाये......फिर 
धीरे से फ़रमाये -
' टेलीफोन और डॉयल टोन में 
आपसी सम्बन्ध है '
आपलोगों को ये 
ग़लतफ़हमी है........और फिर 
हमारे पास 
इन दोनों की कमी है 
इसीलिये सरकार ने 
नया तरीका अपनाया है 
किसीको टेलीफोन 
किसीको डॉयल टोन 
यही हुक्मनामा 
आया है ......  














Monday, September 7, 2015

मन ने कहा ........

आज सुबह-सुबह
मन ने कहा
मेरा मन नहीं लग रहा..
अरे! तुम्हारे पीछे ही तो
सारा दिन बिताती हूँ
तरह-तरह से तुम्हें ही तो
बहलाती हूँ
अच्छा चलो, साहित्य अकादमी या
फिर ज्ञानपीठ
किताबें खरीदेंगे..
अभी-अभी तो गये थे
किताबें भी ली थी
मन ने मना कर दिया..
तो चलो चांदनी चौक,करोल बाग
या कनॉट प्लेस..लेकिन
धूप बड़ी कड़ी है..अच्छा छोड़ो
मॉल चलते हैं
ठंढ़े-ठंढ़े..
नहीं-नहीं ,मॉल नहीं
मन झल्लाकर बोला..
वहाँ यंत्र की तरह घूमते रहना
इस कोना से उस कोना
बड़ी कोफ़्त होती है
दम घुटता है..
तो सुनो ,ऐसा करते हैं
आज सोमवार है
हाट लगता है
मन चहक उठा
हाँ-हाँ वहीँ चलते हैं
वहाँ धरती से जुड़े लोग
मिलते हैं
कहीं कृत्रिम हँसी नहीं
कहीं कोई दिखाबा नहीं
बस..छोटी-छोटी बातें
गाँव-घर की बातें
सील-बट्टा ,चिमटा, अंगीठियां
हरी-हरी,ताज़ी-ताज़ी
मिट्टी लगी सब्जियां..
सीधे-सादे साधारण से लोग
कमर-कन्धों पर
बच्चों को उठाये
कितने स्वाभाविक लगते हैं..
कितने निश्छल लगते हैं..
यही सही है
यही ठीक रहेगा..
चलो वहीँ चलते हैं
मेरा मन लगेगा..

Monday, August 17, 2015

सुबहों का समय .......



सुबहों का समय 
अखबार के पन्नों का
खुल जाना....... 
वो खुशबू भाप की 
उठती हुई 
चाय के प्यालों से……
पराठों की वो प्लेटें 
सब्जियाँ सूखी - करीवाली ,
करारे से पकौड़े 
और भागम- भाग 
वो भगदड़ ……
घड़ी की दौड़ती सूइयों से 
उठते शोर की 
हलचल 
वो जल्दी से भरा जाना 
' टिफिन '
' मिल्टन ' के डब्बों में .......
तुम्हारी याद का आना 
वो मेरा दिल 
बहल जाना .......   

Friday, April 10, 2015

नारी मुक्ति मोर्चा माने या न माने ........

नपे-तुले ,कटे-छंटे
वस्त्र
धारण किये ,
हाथों में
नशीला द्रव्य लिये ,
'चुटकी जो तूने काटी है '
की धुन पर
थिरकते हुये ,
सभ्यता की हदों को
पार करते हुये....... और
दूसरी ओर
लड़कों का शोर
'अच्छी बातें कर ली बहुत
अब करूँगा
गंदी बात '……
अब नारी मुक्ति मोर्चा माने या न माने …… लेकिन अपनी गरिमा को गिराने में इन लड़कियों का हाथ भी कुछ काम नहीं.......

Sunday, February 8, 2015

पिता के बाद ……

पिता के बाद ……

बची हुई माँ 
अचानक 
कितनी निस्तेज 
लगने लगती है……
एक नये प्रतिबिम्ब में 
तब्दील हुई, 
खुद को ही नहीं 
पहचानती है ……
बेरंग आँखों की उदासी से 
उद्धेलित मन को 
बाँधती है,
सुबह-शाम की उँगलियाँ थामे 
अपने-आप ही 
संभलती है,
तूफान के प्रकोप को समेटती हुई 
रुक-रुक कर 
चलती है ………
मन के  
सूनेपन को 
जाने किस ताकत से 
हटाती है ,
यादों के प्रसून-वन में 
हँसती- मुस्कुराती है ,
भावनाओं के साथ 
युद्ध करते हुये 
आँसुओं को 
पी जाती है……और 
कभी कमज़ोर दिखनेवाली 
माँ……
अचानक 
कितनी मजबूत 
लगने लगती है ……… 

Wednesday, November 26, 2014

अंजू शर्मा की बहुत ही सुन्दर कविता है 'चालीस साला अौरतें '……उसी से प्रभावित होकर मैनें लिखी है 'अस्सी साला अौरतें '....... 

ये अस्सी साला अौरतें ....... 
तनी हुई गर्दन,
दमकता हुआ ललाट ,
उभरी हुई नसें……और 
संस्कारों के गरिमा की 
ऊर्जा लिये,
आसमान को छूने की 
ताकत रखती हैं .......
समंदर को सोखने की 
हिम्मत रखती हैं……
छुपाये रहती हैं 
कमर के घेरों में,
उँगलियों के पोरों में ,
आँखों के कोरों में,
कहाँ- कहाँ के किस्से 
कहाँ- कहाँ की कहानियाँ ……
हाथी,घोड़ा,ढ़ोल-मंजीरा  
तोता- मैना ,पापड़-बड़ियाँ……
यादों की चकबन्दी में 
बहलाकर 
बैठा लेती हैं ,
हर मौसम को अलग सुर में 
गुनगुनाकर 
सुना देती हैं .......
अंग्रेज़ों के षड्यंत्र की,
आज़ादी के मन्त्र की,
जमींदारी के अंत की,
गाँव में वसंत की ……
अनुभवों के रसास्वादन से 
जिज्ञासा जगाती,
सुनहली-रुपहली तारों से 
चंदोवा सजाती 
मखमल सी हो जाती हैं 
ये अस्सी साला अौरतें ……
रिश्तों की दुसूती पर 
फूल-पत्ती काढ़ती ……
दबा देती हैं 
अकेलेपन के एहसासों को,
जामदानी,जामावार,
जरदोज़ी की 
आलमारी में.......
सुख-दुःख 
आँखों के पानी से 
धो-पोछकर 
सुखा लेती हैं,
चश्मे के शीशे का 
पर्दा 
लगा लेती हैं .......
नये-पुराने रंगों को 
मिला-मिलाकर मुस्कुराती हैं,
ओढ़ती,बिछाती,
सिरहाने रख 
सो जाती हैं ……
हवा का हर रुख 
महसूस करती
एकदम कोमल…… 
या फिर 
चट्टान सी ……
इन्हें 
हल्के से मत लीजियेगा .......
कमज़ोर मत समझियेगा……
छड़ी हाथों की 
कभी भी 
घुमा सकती हैं …… 
उफ़!
ये अस्सी साला अौरतें
दुनिया भी 
झुका सकती हैं……