Friday, September 9, 2016

नींद की उगाही ..

आज..
नींद की उगाही पर
चलते हैं ..
रह गयी थी जो
जरा सी बेध्यानी में
कुर्सी के हथ्थों पर ..
जल्दबाज़ी में थोड़ी सी
पुराने सोफे के
गद्दों पर ..
आँगन में धूप से
पटी चारपाई पर
ठहर गयी थी ..
चौखट से लगी
चटाई पर
बिखर गयी थी ..
जिम्मे जो लगाई थी
खिड़की पर
हवा को एक रोज़..
रखी थी रास्ते लिये
सामान के साथ
जो चलते वख़्त ..
साँझ की जुगाली में
जुटे हुये
लम्हों से ..
और ..
पलकों को घेरकर बैठी हुई
तीसरे पहर के
उजालों से ..
नींद की उगाही
करते हैं ..
आज..
नींद की उगाही पर
चलते हैं ..

Saturday, September 3, 2016

नारी सशक्तिकरण ..

जहाँ एक ओर इतने ज़ोर-शोर के साथ नारी सशक्तिकरण की बातें होती हैं ..वहीं दूसरी ओर 
अखबार में लड़कियों के लिये वैवाहिक विज्ञापन देते समय हर शैक्षणिक योग्यता के बाबजूद complexion- fair,
Very fair और कभी-कभी तो milky white तक लिख देना ..
शादी के लिये लड़की ढूँढते समय हर गुण के ऊपर गोरे रंग को प्राथमिकता देना ..
गोरे होने के लिये ब्यूटिशियन के यहाँ तरह-तरह के उपचार करबाना..और 
बाज़ार में गोरे होने के लिये भाँति-भाँति के प्रसाधनों का मिलना और तेज़ी से उनकी खपत होना..
 क्या स्त्री को कमज़ोर नहीं बनाती है ? इस मानसिकता के साथ स्त्री सशक्त हो पाती है क्या ? 

Wednesday, March 23, 2016

हम स्नेहक पात पर .......( मैथिली )

हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क            
आयल छी ,
चैत के चंचल हवा
आर
कुसुमी रंग
ल आयल छी .....
हम किरण असमान सँ
धरती सँ
दूभी -धान  लय
गीत सागर के लहर सँ
भ्रमर सँ
मधुपान लय......
खीच क मधु
यामिनी सँ , चाँदनी सँ
ज्योत्स्ना
झिलमिलाहट हम
तरेगन सँ उड़ा
ल आयल छी .......
हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क
आयल  छी .......
रंग गुलाल , अबीरक झोली
श्याम संग
कनुप्रिया के होली
खेलि रहलि छथि
बारि - दुआरि
हर्ष उमंगक
रस में घोली,
अनुपम छवि सँ
प्रीति माँगि कय
आज एतय
ल आयल छी ......
हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क
आयल  छी ........
फाग मचल , उमगल
अंगना - घर
धूम उठल रसिया के
रघुबर कर पिचकारी
भरल अछि
रंग सँ अंग सिया के.....
अद्भुद रूप छटा
सम्मोहन
वैह फुहार ल
आयल छी ......
हम स्नेहक पात पर
सौगात ल क
आयल छी ......
चैत के चंचल हवा
आर
कुसुमी रंग
ल आयल छी......    

Friday, March 4, 2016

टेलीफोन विभाग ......

आज जब लोग इंटरनेट और मोबाईल से इतने बंधे हुये हैं कि इनकी रफ़्तार जरा सी भी धीमी हो जाये तो परेशान हो जाते हैं...... तब मुझे कलकत्ते का 1986 वाला समय बरबस ही याद आने लगता   है ......जब हम पूरी तरह से टेलीफोन पर ही निर्भर थे .....वो भी प्राइवेट कंपनीज की  नहीं , सिर्फ भारत सरकार के  टेलीफोन विभाग पर ......तो आज उसी समय की लिखी हुई और वहीँ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच पर सुनायी हुई  एक कविता आपको सुना रही हूँ...... ( खास बात ये कि  उस समय मेरे पति  चीफ जेनरल मैनेजर , ईस्टर्न टेलीकॉम  रिज़न थे )

टेलीफोन विभाग के 
वरिष्ठ अधिकारी के घर 
छह महीने 
दौड़ने के बाद 
एक साहब के घर 
फोन लग गया..... 
साहब हुये खुश 
उठाया चोंगा लगाया नंबर 
पर ये क्या ?
न डायल टोन , न आवाज़ 
ख़ामोशी का 
साम्राज्य.... 
साहब आ गये 
सकते में 
कैसा ये चक्कर 
पहुँच गये सर के बल 
अधिकारी के दफ्तर ...... 
कॉल-बेल दबाया तो 
पी. ए. बाहर आया 
नाम काम पूछकर 
अंदर पहुँचाया ..... 
अधिकारी ने कहा , बुलाओ 
पी. ए. ने कहा , आओ 
इस प्रकार साहब ने 
अंदर प्रवेश पाया.... 
अधिकारी ने पहचाना , कहा 
कैसे हुआ आना ?
साहब कुछ घबराये 
थोड़ा सकपकाये 
कई बार सर को 
इधर-उधर घुमाये 
फिर बड़ी विनम्रता से 
बोले शालीनता से -
सर , फोन तो लग गया 
पर..... 
डॉयल टोन नहीं आया .....
अधिकारी कुछ गम्भीर हुये 
बिना अधीर हुये 
मेज़ की दराज़ को खिसकाया 
लाइटर निकालकर 
सिगरेट को जलाया..... 
दो-चार लम्बे कश लेकर 
पेशानी पर कुछ 
बल देकर 
थोड़ा गरमाये......फिर 
धीरे से फ़रमाये -
' टेलीफोन और डॉयल टोन में 
आपसी सम्बन्ध है '
आपलोगों को ये 
ग़लतफ़हमी है........और फिर 
हमारे पास 
इन दोनों की कमी है 
इसीलिये सरकार ने 
नया तरीका अपनाया है 
किसीको टेलीफोन 
किसीको डॉयल टोन 
यही हुक्मनामा 
आया है ......  














Monday, September 7, 2015

मन ने कहा ........

आज सुबह-सुबह
मन ने कहा
मेरा मन नहीं लग रहा..
अरे! तुम्हारे पीछे ही तो
सारा दिन बिताती हूँ
तरह-तरह से तुम्हें ही तो
बहलाती हूँ
अच्छा चलो, साहित्य अकादमी या
फिर ज्ञानपीठ
किताबें खरीदेंगे..
अभी-अभी तो गये थे
किताबें भी ली थी
मन ने मना कर दिया..
तो चलो चांदनी चौक,करोल बाग
या कनॉट प्लेस..लेकिन
धूप बड़ी कड़ी है..अच्छा छोड़ो
मॉल चलते हैं
ठंढ़े-ठंढ़े..
नहीं-नहीं ,मॉल नहीं
मन झल्लाकर बोला..
वहाँ यंत्र की तरह घूमते रहना
इस कोना से उस कोना
बड़ी कोफ़्त होती है
दम घुटता है..
तो सुनो ,ऐसा करते हैं
आज सोमवार है
हाट लगता है
मन चहक उठा
हाँ-हाँ वहीँ चलते हैं
वहाँ धरती से जुड़े लोग
मिलते हैं
कहीं कृत्रिम हँसी नहीं
कहीं कोई दिखाबा नहीं
बस..छोटी-छोटी बातें
गाँव-घर की बातें
सील-बट्टा ,चिमटा, अंगीठियां
हरी-हरी,ताज़ी-ताज़ी
मिट्टी लगी सब्जियां..
सीधे-सादे साधारण से लोग
कमर-कन्धों पर
बच्चों को उठाये
कितने स्वाभाविक लगते हैं..
कितने निश्छल लगते हैं..
यही सही है
यही ठीक रहेगा..
चलो वहीँ चलते हैं
मेरा मन लगेगा..

Monday, August 17, 2015

सुबहों का समय .......



सुबहों का समय 
अखबार के पन्नों का
खुल जाना....... 
वो खुशबू भाप की 
उठती हुई 
चाय के प्यालों से……
पराठों की वो प्लेटें 
सब्जियाँ सूखी - करीवाली ,
करारे से पकौड़े 
और भागम- भाग 
वो भगदड़ ……
घड़ी की दौड़ती सूइयों से 
उठते शोर की 
हलचल 
वो जल्दी से भरा जाना 
' टिफिन '
' मिल्टन ' के डब्बों में .......
तुम्हारी याद का आना 
वो मेरा दिल 
बहल जाना .......   

Friday, April 10, 2015

नारी मुक्ति मोर्चा माने या न माने ........

नपे-तुले ,कटे-छंटे
वस्त्र
धारण किये ,
हाथों में
नशीला द्रव्य लिये ,
'चुटकी जो तूने काटी है '
की धुन पर
थिरकते हुये ,
सभ्यता की हदों को
पार करते हुये....... और
दूसरी ओर
लड़कों का शोर
'अच्छी बातें कर ली बहुत
अब करूँगा
गंदी बात '……
अब नारी मुक्ति मोर्चा माने या न माने …… लेकिन अपनी गरिमा को गिराने में इन लड़कियों का हाथ भी कुछ काम नहीं.......