Tuesday, April 19, 2011

वृद्ध होती जा रही.......

वृद्ध होती जा रही.......
असमर्थ ममता,
मांगतीं हैं
उँगलियाँ, मेरी
पकड़ने के लिए
और मुझको वहम है
कि
उँगलियाँ मेरी
बड़ी अब,
हो गयीं हैं.

29 comments:

  1. मॄदुला दी ,सुन्दर भाव जगाती पंक्तियां....

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  2. चुपचाप उद्वेलित कर देने वाली कविता... बहुत सुन्दर...

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  3. गहरे उतरते शब्‍दों के भाव .. ।

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  4. क्या खूब, बहुत बढ़िया।

    वृद्ध होती जा रही.......
    असमर्थ ममता,

    शुक्रिया।

    मार्कण्ड दवे।

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  5. और मुझको वहम है
    कि
    उँगलियाँ मेरी
    बड़ी अब,
    हो गयीं हैं.

    अब क्या कहूँ ....बहुत भावपूर्ण

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  6. वाह मॄदुला दी, जबाब नही इन चार पकंतियो का बहुत सुंदर,धन्यवाद

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  7. क्या वहम और क्या अहसास है.
    'उँगलियाँ मेरी बड़ी अब हो गयी हैं'
    बहुत मृदुलता से अहसास कार्य है आपने मृदुला जी
    मेरे ब्लॉग पर आयें,स्वागत है आपका.

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  8. आदरणीय मॄदुला जी
    नमस्कार !
    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....बहुत भावपूर्ण ..

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  9. बेहतरीन अभिव्यक्ति मृदुला जी ।

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  10. बहुत सूक्ष्म भाव ! थोड़े से शब्दों में कविता बहुत कुछ कह जाती है !

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  11. बहुत कम शब्दों में बहुत सुंदर भाव...

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  12. मृदुला जी! बहुत सुन्दर.. दो पीढ़ियों को एक उंगली से जोड़ दिया आपने! कमाल है!

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  13. kam shabdon me bahut gahri baat.
    bahut achcha.

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  14. बहुत खूब ...लाजवाब ! शुभकामनायें आपके लिए !

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  15. गागर में सागर भर दिया मृदुला जी । बहुत सुंदर ।

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  16. वहा वहा क्या कहे आपके हर शब्द के बारे में जितनी आपकी तारीफ की जाये उतनी कम होगी
    आप मेरे ब्लॉग पे पधारे इस के लिए बहुत बहुत धन्यवाद अपने अपना कीमती वक़्त मेरे लिए निकला इस के लिए आपको बहुत बहुत धन्वाद देना चाहुगा में आपको
    बस शिकायत है तो १ की आप अभी तक मेरे ब्लॉग में सम्लित नहीं हुए और नहीं आपका मुझे सहयोग प्राप्त हुआ है जिसका मैं हक दर था
    अब मैं आशा करता हु की आगे मुझे आप शिकायत का मोका नहीं देगे
    आपका मित्र दिनेश पारीक

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  17. बहुत सुन्दर। समय बीतता है हम बडे होते हैं पर बडे होते नहीं हैं।

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  18. हकीकत बयान की है

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  19. वाह कहूँ या आह?
    खुद की दो पंक्तियाँ याद आ रही हैं
    जो हाथ देते रहे सहारा उंगली बन कर
    वही हाथ अब मेरे काँधे का सहारा मांगते हैं.
    लिखती रहिएगा
    सादर
    प्रदीप www.neelsahib.blogspot.com

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