Friday, May 30, 2014

एक झटके से उठी कुर्सी से......

एक झटके से उठी 
कुर्सी से, कोई नस खिंचा 
झटपट कमर का.……. और 
'मसल पुल' हो गया है.…… 
कभी सीधी,कभी टेढ़ी 
कभी झुककर  
चल रही हूँ,
दर्द से बातें कभी 
बिस्तर पे लेटे  
कर रही हूँ.……
आये हो अच्छे समय से 
है नहीं जाना कहीं 
हमको, 
नहीं आना किसीको ……
ख़्याल मैं रक्खूँगी 
सहलाकर ,लगाकर 'बाम',
करवट मैं 
तुम्हारे ही कहे 
अनुसार लूँगी.....
खाऊँगी ,पियूँगी 
मन भरकर, 
तुम्हारे साथ ही 
गप-शप करूँगी ,
धूप की गर्मी से 
तकिया को गरम कर 
सेक दूँगी……. 
मित्र ,रूककर 
एक-दो दिन ही 
चले जाना.....
कि मैं भी 
कौन बैठी हूँ यहाँ 
हर रोज़ खाली.....

8 comments:

  1. दर्द की इन्तहाँ में भी ये आलम ,ख़ुदाया ख़ैर आपकी लेखनी को सलाम ,बधाइयाँ

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (01-06-2014) को ''प्रखर और मुखर अभिव्यक्ति'' (चर्चा मंच 1630) पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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  3. सटीक चित्रण...

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  4. वाह ये दर्द में भी कविता का आना। पर ठी कहै एक दो दिन का ही अचछा है ये मेहमान।

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  5. जीवन का सत्य बयान किया है आपने.

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