Saturday, June 7, 2014

दिल से दिल तक के रस्ते पर.…….

दिल से दिल तक के 
रस्ते पर 
भारी,ट्रैफिक जाम लगा है.…… 
हर्ष-विषादों की 
जमघट है,
सही-गलत की 
तख्ती है,
चुप्पी की आवाज़ 
घनी है 
अहंकार की 
सख्ती है.…… 
नाराज़ी की भीड़-भाड़ में 
तरल गरल की 
हलचल है,
चढ़ा मुलम्मा छल पर 
निकला,
जिसमें जितना 
बल है……. 
झूठ-शिकायत की 
पेटी है,
इल्ज़ामों के दश्ते हैं,
राजनीति की सधी 
चाल से 
टूटे-बिखरे 
रिश्ते हैं.……. 

6 comments:

  1. bahut sundar.........dil se dil tak ke raste me phul aur kante dono hote hai par chalna to padta hi hai.....

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-06-2014) को ""मृगतृष्णा" (चर्चा मंच-1637) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. उम्दा प्रस्तुति...

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  4. दिल से दिल तक के इस रस्ते पर कोई फूल खिला दे गुलमोहर के..कोई बेंच बिछा दे, दो पल थक कर सुस्ताने के लिए..धूप भी यदि आएगी तो छाया तो मिलेगी..

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  5. इल्ज़ामों के दश्ते हैं,
    राजनीति की सधी
    चाल से
    टूटे-बिखरे
    रिश्ते हैं.……

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ...!!

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