Monday, January 25, 2010

एक शिष्टाचार था..........

आत्मीयता से भरी बातों को
"कुरियर" के सहारे,
मुझ तक पहुँचा दिया,
चलो अच्छा किया
एक शिष्टाचार था
वाकायदा निभा दिया .
विश्वास और अविश्वास के
पलड़े में
झूलता हुआ
अंतर्द्वंद,
मौसम के ढलान पर
अप्रत्याशित परिस्थितियों का
सामना करते हुए,
अपेक्छाओं के मापदंड से
फिसलता गया,
विधिवत प्रक्रियायों को
कार्यान्वित करना,
भूलता गया
और काट-छाँटकर
निकाले हुए समय ने ,
इस लाचार मनःस्थिति को
अपराध मानकर,
अपनी बहुमूल्यता का एलान
इस अंदाज़ में
किया
कि मुज़रिम बनाकर, हमें
कठघरे में
खड़ा कर दिया,
चलो अच्छा किया
एक शिष्टाचार था
अपने ढंग से निभा दिया.

7 comments:

  1. आपका ब्लॉग पहली बार देख....बहुत अच्छा लिखती हैं आप....शिष्टाचार को बहुत अच्छे से निभाया है...बधाई

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  2. अपनी बहुमूल्यता का एलान
    इस अंदाज़ में
    किया
    कि मुज़रिम बनाकर, हमें
    कठघरे में
    खड़ा कर दिया,
    चलो अच्छा किया
    एक शिष्टाचार था
    अपने ढंग से निभा दिया.
    ..behtreen prastuti

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  3. बहुत सुन्दर मृदुलाजी ......शिष्टाचार..औपचारिकता ...बड़े व्यावहारिक से शब्द ...लेकिन फिर भी अपने ऊपर कुछ तो ऐतबार .....बढ़ा जाते हैं....

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  4. निकाले हुए समय ने ,
    इस लाचार मनःस्थिति को
    अपराध मानकर,
    अपनी बहुमूल्यता का एलान
    इस अंदाज़ में
    किया
    कि मुज़रिम बनाकर, हमें
    कठघरे में
    खड़ा कर दिया,
    चलो अच्छा किया
    एक शिष्टाचार था
    अपने ढंग से निभा दिया.

    बहुत सुन्दर एवं प्रभावी ! सार्थक संवेदनशील प्रस्तुति ! शुभकामनाएं !

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  5. मन ने की मन से बाते...अच्‍छी लगी

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