Saturday, March 15, 2014

नीम के पत्ते यहाँ ........

नीम के पत्ते 
यहाँ 
दिन-रात गिरकर,
चैत के आने का हैं 
आह्वान करते, 
रात छोटी ,दोपहर 
लम्बी ज़रा होने लगी है....... 
पेड़ से इतने गिरे पत्ते 
कि दुबला हो गया है 
नीम,जो पहले 
घना था ,
टहनियों के बीच से 
दिखने लगा 
आकाश,
दुबला हो गया है 
नीम,जो पहले 
घना था ....... 
हवा में फैली 
मधुर,मीठी,वसंती 
महक 
अब जाने लगी है…… 
चैत की चंचल हवा में 
चपलता 
चलने लगी है....... 
क्यारियों से फूल पीले 
अब विदा होने लगे हैं 
धूप की नरमी पे 
गरमी का दखल 
बढ़ने लगा है……
सूर्य की किरणें सुबह 
जल्दी ज़रा 
आने लगी हैं,
रात में 
कुछ देर तक 
अब ,चाँद भी 
रहने लगा है....... 
   

13 comments:

  1. प्रकृति वर्णन की अनोखी क्षमता है आपके शब्दों में ..........सहज सुंदर हृदयस्पर्शी ....!!
    बहुत सुंदर रचना ...!!

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  2. बहुत बढ़िया ..होली की शुभकामनायें

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  3. बहुत उम्दा प्रस्तुति...!
    होली की हार्दिक शुभकामनायें ।
    RECENT POST - फिर से होली आई.

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन संदीप उन्नीकृष्णन अमर रहे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. सुंदर रचना...रंगों से सराबोर होली की शुभकामनायें...

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  6. बहुत सुंदर रचना..

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  7. आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (13-04-2014) को ''जागरूक हैं, फिर इतना ज़ुल्म क्यों ?'' (चर्चा मंच-1581) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर…

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  8. सुन्दर चैत्र चित्र

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  9. वाह ! बहुत खूब ! चैत्र की मुलायम धूप एवं उजली रातों का बड़ा ही मनोरम चित्र खींचा है ! बहुत ही मनभावन रचना !

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  10. waahh sundar .. drishya varnana :)

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  11. प्रकृति‍ का सुंदर वर्णन

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