Saturday, July 31, 2010

वो दरम्यां के दिन नहीं........

वो दरम्यां के दिन नहीं ,
वो तुम नहीं ,
वो हम नहीं .
न वो फ़ुर्सते-वक्ते-सहर,
नूरे-शबा का 
असास है,
न वो ज़र्फ़ वो
फर्ज़ानगी, जादे-सफ़र
मेरे पास है .
न वो माईले-परवाज़
मन ,
न वो ख्वाबीदा
कलियाँ कहीं ,
न वो बादवां,सहने-
चमन,
बेमानियाँ बातें
रही.
न वो इन्तहा-ए-सादगी,
न वो नग्मा-ए-कोकब
कहीं,
न वो हर्फ़े-शीरीं,
हुक्मे-मानी,
रौनके-हस्ती
रही .
न वो फल्सफयाना
हमनवा,
न वो हमख्याल न
हमइना,
न वो ज़ाफरानी
रंगे-बू,
शाख़े-सजर
हसरत
रही.
बस मुसलसल
बारे-ग़म का, है
तलातुम,
और समय की
बेखबर,
रफ़्तार है,
साथ वो बीता सफ़र,
बीते सफ़र का
प्यार है.
असास- पूंजी,ज़र्फ़-सामर्थ्य ,फ़रज़ानगी-बुद्धिमत्ता ,जादे-सफ़र-यात्रा का साथी,माईले-परवाज़-आसमान में उड़ान भरनेवाला, ख्वाबीदा-ख्वाबों में खोई,कोकब-सितारे,हर्फ़े-शीरीं- मीठे -बोल ,हुस्ने-मानी-विश्व का सोंदर्य ,
हमनवा -परस्पर बात करनेवाले ,हमइना-सहगामी,मुसलसल-निरंतर ,बारे-ग़म-ग़म का बोझ ,तलातुम-उथल -पुथल

38 comments:

  1. वो दरम्यां के दिन नहीं ,
    वो तुम नहीं ,
    वो हम नहीं .
    न वो फ़ुर्सते-वक्ते-सफ़र ,
    नूरे-शबा का
    असास है,
    न वो ज़र्फ़ वो
    फर्ज़ानगी, जादे-सफ़र
    मेरे पास है .

    Kya gazab likha hai aapne! Maun kar diya!

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  2. बस एहसास और यादे ही रह जाती हैं ....और लहरों के जाने के बाद के गुबार ही देखते रह जाते हैं.

    अच्छी नज़्म.

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  3. मर्मस्पर्शी नज़्म... बधाई स्वीकारें। सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  4. जैसे किसी बिछड़े दोस्‍त की याद आई है।

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  5. बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!
    मित्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ!

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  6. वो दरम्यां के दिन नहीं ,
    वो तुम नहीं ,
    वो हम नहीं ......
    sunder prastuti hetu abhaar...

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  7. मन की गहराइयों से कही गईं
    बहुत ही शिद्दत से लिखी गईं
    और
    उसी लगन ही से पढी गईं
    बहुत ही असरदार यादों की लड़ियाँ

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  8. मृदुला उर्दू क्लासेस!
    बेहद उम्दा!
    भई हम तो मुरीद हुए!

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  9. नज्म अच्छी लगी , बस थोड़े से शब्द मुश्किल लग रहे थे ,जिन्हें अर्थ पढ़ कर समझना आसान हो गया । आपने दरमयां के दिन लिखा है , कुछ इसी तरह मैंने लिखा था ...जिन्दा तो कर लें ..कहाँ हैं वो हम ..कहाँ हो वो तुम ...खो गए रास्ते ...पूरी नज्म ' सफ़र के सजदे ' पर 'जरुरी नहीं के ' मेरी आवाज में है । आपकी बाकी नज्में भी पसंद आईं ...आपने माँ को बदले हुए देखा , मैंने पिता को इसी हाल में पाया । टिप्पणी के लिए धन्यवाद , उसी के जरिये मैं आपके ब्लॉग तक पहुच सकी ।

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  10. extremely touching...and emotional...

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  11. बहुत खूबसूरती से लिखा..बधाई. कभी 'डाकिया डाक लाया' पर भी आयें...

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  12. बहुत अच्छा लिखा आपने ..मुझे पसंद आई.......'पाखी की दुनिया' में भी घूमने आइयेगा.

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  13. sundar rachna...........par urdu ke ye lajz kaise apnee rachaon pe aur kaise apne soch me laa pati hain..........:)

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  14. न वो इन्तहा-ए-सादगी,
    न वो नग्मा-ए-कोकब
    कहीं,
    न वो हर्फ़े-शीरीं,
    हुक्मे-मानी,
    रौनके-हस्ती
    रही .
    न वो फल्सफयाना
    हमनवा,
    न वो हमख्याल न
    हमइना,
    न वो ज़ाफरानी
    रंगे-बू,
    शाख़े-सजर
    हसरत
    रही.
    बस मुसलसल
    बारे-ग़म का, है
    तलातुम,
    और समय की
    बेखबर,
    रफ़्तार है,

    कुछ कहने से बेहतर है कि यह कहूं..

    ढूंढेगी सबा खुद को ,वो वक्त भी आयेगा
    हर शख्स आईने से पूछेगा ‘‘मैं कहां हूं ?’’

    बेचैनी इंसान की हमजाद है शायद!!

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  15. उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ!!! इतना खुबसूरत एहसास और ई गालिबाना अंदाज़... मन मिजाज खुस हो गया पढकर.

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  16. sundar rachna......
    mere naye blog par aapka sawagat hai..apna comment dena mat bhooliyega...

    http://asilentsilence.blogspot.com/

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  17. बस मुसलसल
    बारे-ग़म का, है
    तलातुम,
    और समय की
    बेखबर,
    रफ़्तार है
    mridula ji pahle to aapki nazm samajh me nahi
    aai . fir bhi thoda -thoda andaja lagarahi thi ki ye gujare hue waqt ka afsaana hai tabhi nazar diye gaye shabdo ke arth par padi .fir to pura matlab hi samajh me aa gaya.
    bahut hi sarthakta liye hui aapki nazm.bahut hi achhi. urdu shabdo se thoda thpda jankaari dene ke liye shkriya.
    poonam

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  18. मेरी रचना पर आपकी टिपण्णी के लिए बहुत शुक्रिया. इसी से आपके ब्लॉग तक आ सका... बहुत ही ख़ूबसूरत नज़्म से मुलाक़ात कर सका...
    बस मुसलसल
    बारे-ग़म का, है
    तलातुम,
    और समय की..... बहुत ही बढ़िया.
    मुबारकबाद. आईंदा भी मेरे ब्लॉग में आकर अपनी बेबाक टिपण्णी जरुर दर्ज कराते रहें.

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  19. awesomely awesome!

    हिंदी में लौटूं....गज़ब..विस्मित हूँ, मौन हूँ...आँखें कटोरों से बाहर हुई जाती हैं...ख़ूबसूरत शब्द...बेहद ख़ूबसूरत

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  20. बहुत खूब निखा है |बधाई |मेरे ब्लॉग पर आ कर प्रोत्साहित करने के लिए आभार |
    आशा

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  21. आपकी टिपण्णी के लिए आपका आभार ...अच्छी कविता हैं...बहुत अच्छी .

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  22. बहुत उम्दा ..!!

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  23. mridula ji , aapki kvita ka subject bhut umda hai .hr sikke ke do phlu hote hai.meri bat ko anytha mt lijiyega , ye request hai .
    di ! ek trf urdu shbdo ki bhulta ke karn kvita me lyatmkta ki kmi ld rhi thi halaki aapne sbhi kthin shbdo ka arth spsht kr diya tha .
    iska dusra pksh ye hai ki hm sbhi aapke aabhari hai ki aapne ek aisi bhasha ke tmam shbdo se pathko ka prichy kraya jo hmare desh me prvah purvk boli jati hai .
    ek bar punh aabhar .

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    स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

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  25. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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  26. आसमान
    नीला होता था,
    पानी का रंग पन्ने जैसा ,
    रूबी जैसा मन,
    रहता था.
    रेशम के धागे,
    उलझ-उलझ कर,
    टूट गए और
    लम्हे सारे बिखर गए,
    सपनों से हम
    ऐसे जागे कि
    चलते-चलते फ़िसल गए.
    vaah...kitani umda nazm hai. mubarakbaad.

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  27. aaabhar ...aap blog tak aaye
    बस मुसलसल
    बारे-ग़म का, है
    तलातुम,
    और समय की
    बेखबर,
    रफ़्तार है,
    साथ वो बीता सफ़र,
    बीते सफ़र का
    प्यार है.


    javab nahi laajajavab
    har lihaaj se
    shabd bhaav or andaj-e-bayan
    yakinan kabil e-daad
    daad hazir hai kubool karen

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  28. You are amazingly talented. Words seem to flow effortlessly from your pen.

    On a lighter note, I am glad you have given the word meanings at the end.

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  29. ऊपर की कविता पढने के बाद थोडा पीछे आई और मिली ये प्या री सी नज्म णुश्किल उर्दऊ को आप ने अर्थ देकर समझा ही दिया बहुत ही सुंदर
    बस मुसलसल
    बारे-ग़म का, है
    तलातुम,
    और समय की
    बेखबर,
    रफ़्तार है,
    साथ वो बीता सफ़र,
    बीते सफ़र का
    प्यार है.

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  30. खूबसूरत रचना

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