Thursday, November 25, 2010

टूटी हुई,जंग लगी......

टूटी हुई,जंग लगी
लोहे की
एक कड़ाही,
लुढ़की पड़ी है
मेरे घर के , पिछले कोने में .
कितनी होली-दिवाली
देख चुकी है ,
बनाए हैं कितने पकवान
वर्षों तक ,
धुल-धुल कर,सुबह-शाम
चमका करती थी,
कभी पूरी ,कभी हलवा
चूल्हे पर ही
 रहती थी .
 नित्य,
नए स्वाद का
निर्माण करती थी ,
तृप्ति के आनंद का
आह्वान,
करती थी.
टूटी हुई,जंग लगी   
लोहे की
एक कड़ाही,
लुढ़की पड़ी है
मेरे घर के, पिछले कोने में........
आते-जाते
कभी-कभी
पड़ जाती है नज़र
उस कोने में,
थम जाता है समय,
सहम जाता है 
मन ,
तैरने लगती है 
हवाओं में, व्यथाओं की 
टीस
और अचानक ,
घूम जाता है मेरी आँखों में,
अपनी 
माँ का चेहरा.

54 comments:

  1. बेहद मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी चित्रण।

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  2. बहुत ही भावमय करते शब्‍द ...।

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  3. बहुत जबरदस्त बिंब ... लिखते रहिये ...

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  4. माँ की याद दिला दी इस कविता ने,
    सच इतना अच्छा बिंब, इतना अच्छा मार्मिक चित्रण
    The Best रचना

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  5. एक कड़ाही,
    लुढ़की पड़ी है
    मेरे घर के, पिछले कोने में........
    आते-जाते
    कभी-कभी
    पड़ जाती है नज़र
    उस कोने में,
    थम जाता है समय,
    सहम जाता है
    मन ,
    तैरने लगती है
    हवाओं में, व्यथाओं की
    टीस
    और अचानक ,
    घूम जाता है मेरी आँखों में,
    अपनी
    माँ का चेहरा.
    kuch kahne ko shabd nahin

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  6. गहन संवेदनाओं की बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  7. इसे कहते हैं सृजनात्मकता मृदला जी
    बहुत बढ़िया !
    मन को छू गई कविता

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  8. बहुत ही मार्मिक मोड़ दिया है आपने इस रचना को ... ये zamane की रीत है ... ये यादें एक पीड़ी से आगे नहीं बढ़ पातीं ...

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  9. और अचानक ,
    घूम जाता है मेरी आँखों में,
    अपनी
    माँ का चेहरा.
    ma ma hoti hai kadhai nahi hoti .
    ma kabhi ek kone main nahi rahti.
    ma hamesa bacchho ke dil main, man main hamesa rahati hai.aapne ma ki yaad dila dee.
    ab jaldi milane jana hai.

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  10. Hi..

    Maa ki yaad basi hai jisme..
    Us se man ka hai sambandh..
    Bhale aaj wo padi nirarthak..
    Pakwanon ki liye sugandh..

    Sundar abhivyakti..

    Deepak..

    ReplyDelete
  11. Hi..

    Maa ki yaad basi hai jisme..
    Us se man ka hai sambandh..
    Bhale aaj wo padi nirarthak..
    Pakwanon ki liye sugandh..

    Sundar abhivyakti..

    Deepak..

    ReplyDelete
  12. ओह ..सच है उपयोगिता न रह जाने पर यूँ ज़िंदगी में भी जंग लगना जैसा ही महसूस होता है ..बहुत मार्मिक चित्रण

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  13. संवेदनाओं से ओतप्रोत सुन्दर कविता.climax बहुत ही अच्छा..

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  14. और अचानक ,
    घूम जाता है मेरी आँखों में,
    अपनी
    माँ का चेहरा.
    बहुत भावमय रचना..

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  15. घूम जाता है मेरी आँखों में
    अपनी
    माँ का चेहरा

    सच है,
    घर की पुरानी चीजों से कुछ ज्यादा ही लगाव हो जाता है, बिल्कुल परिवार के सदस्य की तरह।
    बेहतरीन कविता।

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  16. मृदुला जी! दोनों अन्नपूर्णा! एक दूसरे की पर्याय और प्रतीक! कोई भी पाठक इस कविता को पढकर यादों में खोए बिना न रह पाएगा!!

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  17. मनपटल पर गहरी छाप छोडती हुई -
    मर्मस्पर्शी रचना -
    बधाई एवं शुभकामनाएं.

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  18. बहुत ही मर्मस्पर्शी,भावमय कविता है। बधाई और शुभकामनायें।

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  19. bahut khub.............tuti hui kadhai me maa ki yaad ka dikhna..........achchha laga...:)

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  20. सच तो यह है कि अति वृद्धावस्था में लगभग सभीके तन उस टूटी हुई कड़ाहीकी तरह हो जाते हैं, कुछ करने कि क्षमता से रहित पुरानी यादें भीतर ही समेटे हुए ...

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  21. टूटी हुई,जंग लगी
    लोहे की
    एक कड़ाही,
    लुढ़की पड़ी है
    मेरे घर के , पिछले कोने में .
    कितनी होली-दिवाली
    देख चुकी है ,
    बनाए हैं कितने पकवान
    वर्षों तक ,
    धुल-धुल कर,सुबह-शाम
    चमका करती थी,
    ....gahre bhav samete bhavpurn marmsparshi rachna ke liye aabhar..

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  22. टूटी हुई,जंग लगी
    लोहे की
    एक कड़ाही,
    लुढ़की पड़ी है
    मेरे घर के, पिछले कोने में........

    और अचानक ,
    घूम जाता है मेरी आँखों में,
    अपनी
    माँ का चेहरा.

    औरत के जीवन की त्रासदी है बयां करती है आपकी नज़्म .....
    बेहतरीन भावाभिव्यक्ति ......!!

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  23. मृदुला जी
    बेहतरीन प्रस्तुति .गहरे जज्बात के साथ लिखी गई सुंदर कविता .

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  24. बहुत ही मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी प्रस्तुति...आभार

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  25. sach mein , bahut marmik kavita hai

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  26. माँ को याद करती हुई कविता मर्मस्पर्शी हो गई है ! बधाई !

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  27. संसार में स्मृतियाँ ही तो हैं जो बीते दिनों का आभास कराती हैं!

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  28. इस प्रकार की रचनाओं के पीछे की गहन आत्मीयता देखी जा सकती है, साफ साफ.

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  29. ... bahut sundar ... prasanshaneey rachanaa !!!

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  30. टूटी हुई...,प्रवासी..व विदेश में बसे भारतीयों के नाम कविताएं आपकी दूसरी कविताओं की तरह ही अपने साथ एक पूरा संसार लिये हैं । भावमय संसार..।

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  31. सीधे दिल को छूती एक सुन्दर रचना .....आप मेरे ब्लॉग तक आई मेरा हौसला बढाने के लिए बहुत शुक्रिया ..
    आदर सहित
    मंजुला

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  32. Oh....My....God....!!! Truly speechless.....amazing

    poori hi nazm khoobsurat bhaavon se sarabor thi....uspar aakhiri line to bas...!! qatl !!! toooooooooo good

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  33. सचमुच निःशब्द कर दिया आपकी इस रचना ने । एक कढाई के माध्यम से कितनी बडी बात कह दी ।

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  34. लगा कि कुछ नया सा पढ़ रहा हूँ ! शुभकामनायें !

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  35. मृदुला जी,

    मेरे ब्लॉग जज़बात ...दिल से दिल तक पर आपकी टिपण्णी का तहे दिल से शुक्रिया......आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ......

    कितनी सुन्दर रचना है आपकी वाह.....एक टूटी कढ़ाही और अंत में माँ का चेहरा...उफ़ कितना बेहतरीन...

    देर से आने की माफ़ी के साथ आज ही आपको फॉलो कर रहा हूँ ताकि आगे भी साथ बना रहे......शुभकामनायें|

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  36. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी इस रचना का लिंक मंगलवार 30 -11-2010
    को दिया गया है .
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

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  37. और अचानक ,
    घूम जाता है मेरी आँखों में,
    अपनी
    माँ का चेहरा.

    माँ हर जगह याद आती हैं... सबसे प्यारी चीज भूले ही कब है...:)
    बहुत ही ख़ूबसूरत रचना

    ReplyDelete
  38. और अचानक ,
    घूम जाता है मेरी आँखों में,
    अपनी
    माँ का चेहरा.
    बहुत ही ख़ूबसूरत रचना

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  39. वाह-वाह ! कल्पना, यथार्थ और भावनाओं की सुंदर जुगलबंदी है।

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  40. हृदयस्पर्शी रचना... आभार. (शुक्रिया चर्चामंच)

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  41. कविता बहुत सुन्दर और भावपूर्ण है। बधाई।

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  42. आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ ...बहुत सुन्दर रचना पढने को मिली ............

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  43. और घूम जाता है माँ का चेहरा...
    गहरी संवेदनात्मक कविता ..!

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  44. मृदुला जी,
    निशब्द!
    आशीष
    ---
    नौकरी इज़ नौकरी!

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  45. आदरणीया मृदुला जी,
    नमस्कार !
    सीधे सरल लहजे में आपने भावनाओं का सैलाब ला दिया है । मेरे घर में भी ऐसी बहुत सारी चीजें हैं , जो पुरानी स्मृतियों को ताज़ा करके अक्सर भावुक बना देती हैं ।
    बीते हुए कल में झांकना बहुत मुश्किल काम है … लेकिन उपाय भी नहीं … … …

    पड़ जाती है नज़र
    उस कोने में,
    थम जाता है समय,
    सहम जाता है
    मन ,
    तैरने लगती है
    हवाओं में, व्यथाओं की
    टीस


    अत्यंत संवेदनशील , आत्मा को स्पर्श करने वाली पंक्तियां हैं ।

    ईश्वर-कृपा से मेरे सिर पर अभी मां का साया है , आप मेरे इस सौभाग्य के बने रहने की दुआ करें …

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  46. सुन्दर रचना......

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  47. mridula ji
    kya likhun ,likhne ke liye shabd bache hi nahi.
    man ko jhakjhorati hue aapki itni sundar prastuti ke liye hardik badhai.
    मन ,
    तैरने लगती है
    हवाओं में, व्यथाओं की
    टीस
    और अचानक ,
    घूम जाता है मेरी आँखों में,
    अपनी
    माँ का चेहरा.
    kuch kahne ko shabd nahin

    poonam

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  48. हृदयस्पर्शी रचना.

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