Sunday, February 12, 2012

हर रोज़ नए-नए तरक़ीब से.......

हर रोज़ 
नए-नए तरक़ीब से ,
मन को 
उठाने ,बैठाने,बहलाने के,
पचीसों वज़ह,
ढूंढकर लाती हूँ......और 
कभी बेवज़ह,
वज़ह बनाकर,
ख़ुद को 
समझाकर,
खड़ी हो जाती हूँ.
समय के साथ 
खिट-पिट 
चलती है,
घड़ी
लगातार
मुश्तैद रहती है,
दस बज गए-
'नाश्ता कर लो',
बारह बज गए-
'चाय पी लो',
ये बज गया-
'वो कर लो ',
वो बज गया -
'ये कर लो '.
नियंत्रण 
कड़ा रहता है,
मैं सोचती हूँ ........
अच्छा रहता है,
एक 
पहरा रहता है.
रोक-टोक 
बनी रहती है ,
नोक -झोंक 
बनी रहती है
वरना......
मनमानी की 
ज़मीन पर,
अहंकार की फ़सल
तैयार 
होने में,
देर कहाँ लगती है?




40 comments:

  1. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  2. वाह..
    बहुत गहरी बात कह दी आपने..

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  3. वरना......
    मनमानी की
    ज़मीन पर,
    अहंकार की फ़सल
    तैयार
    होने में,
    देर कहाँ लगती है?


    बहुत बढ़िया ....

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  4. मनमानी की
    ज़मीन पर,
    अहंकार की फ़सल
    तैयार
    होने में,
    देर कहाँ लगती है?

    सुन्दर भाव..

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  5. Nice Blog , Plz Visit Me:- http://hindi4tech.blogspot.com ??? Follow If U Lke My BLog????

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  6. सुंदर अभिव्यक्ति..

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  7. संवेदनशील रचना। बधाई।

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  8. स्वयं को अन्य-पुरुष की तरह देखना और स्वयं के अहंकार पर नियत्रण के उपक्रम!! बहुत गहरी कविता!!

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  9. kuch chuni hui panktiyaan nahi likh paya yahan..
    har ek lafz guthaa hua hai ek doosre mein..

    behtareen rachna.. :)


    palchhin-aditya.blogspot.in

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  10. खूबसूरत ...
    kalamdaan.blogspot.in

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  11. bahut hi khoobsoorat prastuti pardhan ji ...badhai.

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  12. मनमानी की
    ज़मीन पर,
    अहंकार की फ़सल
    तैयार
    होने में,
    देर कहाँ लगती है?
    sahi kaha aapne sunder abhivyakti
    rachana

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  13. अच्छा रहता है,
    एक
    पहरा रहता है.
    रोक-टोक
    बनी रहती है ,
    नोक -झोंक
    बनी रहती है
    वरना......
    मनमानी की
    ज़मीन पर,
    अहंकार की फ़सल
    तैयार
    होने में,
    देर कहाँ लगती है?
    ...bahut sudnar prerak rachna..
    ..... ..bahut sundar man ki udhedbun

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  14. मनमानी की
    जमीन पर,
    अहंकार की फसल
    तैयार
    होने में,
    देर कहाँ लगती है?

    अच्छी उपमाएं,
    यथार्थपरक कविता।

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  15. ये बज गया-
    'वो कर लो ',
    वो बज गया -
    'ये कर लो '.
    बहुत बढ़िया...

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  16. विचारणीय..... सशक्त अभिव्यक्ति .

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  17. bahut hi umda rachna hai ,bdhai aap ko

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  18. गौ वंश रक्षा मंच: श्री गोपाल गौशाला
    gauvanshrakshamanch.blogspot.com

    par aap saadar aamntrit hai ...shukriya

    प्रत्‍युत्तर दें

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  19. बहुत बेहतरीन....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  20. अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन सुंदर रचना,...

    MY NEW POST ...कामयाबी...

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  21. अच्‍छी प्रस्‍तुति

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  22. bahut hi sarthak prastuti .
    samay ki pabandi bahut hi jaruri hai varna sab kuchh asamany sa ho jaata hai-----
    poonam

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  23. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति...

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  24. हलके फुल्के शब्दों मे कितनी बड़ी बात कह दी आपने ...

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  25. दस बज गए-
    'नाश्ता कर लो',
    बारह बज गए-
    'चाय पी लो',
    ये बज गया-
    'वो कर लो ',
    वो बज गया -
    'ये कर लो '.
    नियंत्रण
    कड़ा रहता है,

    aisa hi to hota hai:))

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  26. bahut gahri soch...
    मनमानी की
    ज़मीन पर,
    अहंकार की फ़सल
    तैयार
    होने में,
    देर कहाँ लगती है?
    shayad aise hi jivan sukhmay chalta hai warna...

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  27. यथार्थ से सकारात्मक समझौता , सुंदर रचना.

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  28. मनमानी की
    ज़मीन पर,
    अहंकार की फ़सल
    तैयार
    होने में,
    देर कहाँ लगती है?
    sach k roobroo karati panktiyaan,sunder....

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  29. सुंदर प्रस्तुति !
    आभार !

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  30. बेहतरीन सुंदर रचना, बहुत अच्छी प्रस्तुति,

    MY NEW POST ...कामयाबी...

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  31. बहुत ही भाव प्रवण कविता । मन को आंदोलित कर गयी । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार है । धन्यवाद ।

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  32. बहुत खूब लिखा है |
    आशा

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  33. कभी बेवज़ह,
    वज़ह बनाकर,
    ख़ुद को
    समझाकर,
    खड़ी हो जाती हूँ.
    समय के साथ...gahan behad gahen.............

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  34. बहुत बढ़िया,बेहतरीन अच्छी प्रस्तुति,.....

    MY NEW POST...आज के नेता...

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  35. बढ़िया कविता... बहुत सुन्दर....मन में उतर जाती हैं आपकी कवितायें... सादर

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  36. बहुत सुंदर

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  37. बहूत हि सुंदर रचना है
    बेहतरीन अभिव्यक्ती..

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