Monday, September 3, 2012

बूझिये नईं पड़ल......

मिथिलाक माटी में,
मधु-श्रावनिक
हास-परिहास एवं मिठास 
घोरैत-घोरैत, 
कखन एही भाषा में 
लिखय लगलौं,
बूझिये नईं पड़ल......
घर-गृहस्थिक  मथ-भुक्की में 
दही-चुड़ा, बैगनक भIर सँ 
प्रभावित,
जमबैत,कुटैत,तौलैत 
कोन बेर 
कागज़-कलम 
माथ पर सवार भ गेल
बूझिये नईं पड़ल......
समदाऊनी के गीत 
सुनि क,
विद्यापतिक कविता 
पढि क,
खबासक अनुपस्थिति में 
चूल्हा पजाडि क,
अदौड़ी,तिलौड़ी,दनौड़ी
पारि क,
कखन कविता पारय लगलौं 
बूझिये नईं पड़ल.....
सावन-भादो क झींसी सँ 
नुका क,
नेना -भुटका क 
कोर में बैसा क,
गोनू झा क गप्प सँ 
सभके हँसा क,
पितरिया कजरौटा में 
काजर सेका क,
कखन कविता सेकय लगलौं 
बूझिये नईं पड़ल......
भिन्सरहे भानस,भात 
पसाई क,
तीमन-तरकारिक कठौती 
सजाई क,
अंगना,ओसारा,चबूतरा 
बहारि क,
गम-गम घिऊ में 
सोहारी छानि क,
कखन कविता छानय लगलौं 
बूझिये नई पड़ल......
आ मूल बात ई 
जे घोर-मठ्ठा
करैत-करैत,अनचोक्के
'ई-विदेह' सँ परिचय 
भ  गेल......आ 
देखिते-देखिते 
मिथिलाक पैघ समाजक 
कोन में,
हमरो प्रविष्टि भ गेल.


17 comments:

  1. बहुत मीठी भाषा है ... सुनने में अच्छा लगता है

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  2. bahut achhe achhe naye shbd padne ko mile kuch samjh aaye kuch nahi (JYADA NAHI)...sundar prastutikaran..

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  3. मृदुला जी,
    आज लिखना तो मैथिली में चाहता था, लेकिन पहली बार अपनी विवशता का अनुभव हुआ है.. इस मधुर भाषा के प्रति अपनी अनभिज्ञता का.. कविता की भाषा और भाव इस प्रकार पाठक के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं कि भाषा से परे भाव ह्रदय में घर कर जाते हैं..
    नारी विषय पर इतनी सुन्दर कविता बहुत दिनों बाद पढ़ने को मिली है.. आज इस कविता ने सोचने पर विवश कर दिया कि कितनी नारियों के मन में ऐसे ही कविता जन्म लेती होगी और शायद अभिव्यक्त भी न हो पाती हो!!
    एक बार फिर आभार, इस सुन्दर कविता के लिए!!

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    1. सही कहा आपने। नारियों के मन में ऐसी कितनी ही कवताएं सिर्फ भाव रूप में जनम लेकर मर जाती होंगी!

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 4/9/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच http://charchamanch.blogspot.inपर की जायेगी|

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  5. मीठी भाषा की मीठी रचना बहुत प्यारी लगी ............

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  6. बूझीं गइलीं आखर आखर
    नाहीं जनतीं मिथिला तs का
    मिथिला क माटी लागल आपन माटी जस...
    जै हो.....

    गजबै मिठास बा
    अजबै पियास बा
    बूझीं गइली आखर आखर
    नाहीं जनतीं मिथिला तs का...
    जै हो....

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  7. ई कविताक मिठास बड्ड मिट्ठ लागल!

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  8. वाह ... मधुर से शब्‍द मधुर सी कविता ..

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  9. गुड़ सा घुल गया मन में..अच्छी लगी मिठास..

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  10. जब सबको मीठा लग रहा है तो मेरे पास कहने के लिए यही है कि बहुत रसदार लगा । धन्यवाद ।

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  11. स्पैम से बाहर निकालें मेरी टिप्पणी को!!

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  12. अपने लेखन की शुरुआत की मीठी प्रस्तुति ।

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  13. ई कविताक हिंदी अनुवादो संग ब्लॉग जगत के परिचय करबिय‍उ!
    (इस कविता का हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत करें, यह हमारा निवेदन है।)

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    1. hum apke kahe anusar is kavita ka hindi anuwad zaroor likh kar dalenge......dhanybad.

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