Saturday, December 15, 2012

जाड़ों की सुबह-सुबह........

जाड़ों की सुबह-सुबह
सरकाकर सारे पर्दों को,
खोलती हूँ
दरवाज़ा जो.......
मखमली धूप
खिड़की की छड़ों से
छनकर,
हमारी दहलीज को
पारकर,
कमरे की हर चीज़ को
छूने का प्रयास
करती हुई,
छू लेती है........
बिखेड़ती हुई,
अपनी गरिमामय
मुस्कुराहट
कोने-कोने में.......
इस सुनहले स्पर्श के
सम्मोहन से
खिल उठता  है
मन-प्राण
और
आत्मसात कर लेती हूँ
इस छुअन को,
अगली सुबह तक के लिये.



15 comments:

  1. मखमली धूप सी कोमल रचना..

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  2. कुनमुनी धूप का अलग ही होता है मज़ा ...

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  3. सर्दी में धूप का अहसास कराती सुन्दर रचना..

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  4. थोड़ा और प्रयास बहुत सुन्‍दर होता । धन्‍यवाद ।

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  5. बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

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  6. सर्दी और धूप का अहसास कराती उम्दा प्रस्तुति ,,,, बधाई।

    recent post हमको रखवालो ने लूटा

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  7. कोमल ...सुंदर एहसास .....
    शुभकामनायें ....

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  8. ताज़ी-ताज़ी गुनगुनी धूप सी सुन्दर रचना...

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  9. sardiyon me man ko bha jaye dhup

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  10. सर्दियों का खुबसुरत चित्रण.

    सादर.

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  11. खुबसुरत चित्रण....सर्दियों का मृदुला जी

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  12. सर्दियों की धूप अनमोल होती है..सुंदर कविता !

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  13. बहुत ही भाव-प्रवण कविता । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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