Thursday, April 10, 2014

जूही-बेला की पंखुड़ियों में.......

जूही-बेला की 
पंखुड़ियों में 
लिपटी हुई शाम.…… 
रजनीगंधा के किनारे,
चंपा,चमेली,रात-रानी का 
सानिध्य......
बारों-छज्जों पर 
वसंत-मालती का 
अल्हड़पन......
इठलाता मुंडेर पर 
लाल-पीला 
वोगन-विलिया.....
तुम ही कहो,
मुझे कश्मीर की 
वादियों से
क्या लेना.......  
 

6 comments:

  1. :-) बहारों का मौसम मेरे आँगन में है.....

    अनु

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.04.2014) को "शब्द कोई व्यापार नही है" (चर्चा अंक-1579)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. मन चंगा तो कठौती में गंगा...

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  4. जब कश्मीर आंगन में हो तो क्यूं जायें वहां।

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  5. kshmir aur kanyakumari ham apane man se jud kar khushnuma mahasoos karte hain . man khush to prakriti ke sath kahin bhi ham khush. bahut sundar likha .

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  6. सच कहा....इन फूलाें के बीच कि‍से कश्‍मीर की याद आएगी...

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