Thursday, April 3, 2014

तुम्हारी खामोशियों की सतह पर.......

तुम्हारी खामोशियों की 
सतह पर....... 
छूट दे रखी है 
मैंने,
अपने प्रश्नों को 
बैठने की…… 
शब्दों को 
टहलने की…… 
कि एक तारतम्य तो 
बना रहे…… 
जैसे भी हो…… 

10 comments:

  1. Behad sundar! Maaf karen ki mai kharab tabiyatke karan niyamse comment nahi kar pati hun.

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  2. कागज़ की ख़ामोशी पे उभरे शब्दों से अनेकों प्रश्न वाह वाह क्या उम्दा सोच आपकी दीदी जी बेहद लाज़वाब, ये आपकी अभिव्यक्ति

    एक नज़र :- हालात-ए-बयाँ: ''भूल कर भी, अब तुम यकीं, नहीं करना''

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  3. बहुत सुन्दर...मृदुला जी

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  4. उम्दा है मृदुला जी |

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  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

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  6. सुन्दर शब्दों में बाँधा !

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (06-04-2014) को "खामोशियों की सतह पर" (चर्चा मंच-1574) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चैत्र नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
    परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. सुन्दर रचना

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  9. परखना मत परखने से कोई रिश्ता नहीं रहता...बहुत खूबसूरत तरीका लगा आपका...

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