Sunday, April 27, 2014

रच नहीं पाती मैं .......

रच नहीं पाती मैं 
बेबाक,बिंदास,तुकांत,
अतुकांत, 
'तहलका' मचानेवाले 
शब्दों के सौजन्य से,
कोई एक कविता......
विफल हो जाता है मेरा 
हर प्रयास,
इनकार कर देती है 
कलम,चलने से........ 
या फिर.…फैल जाती है 
स्याही कागज़ पर,
सारे लिखे को 
धुँधला कर देती है.…… 
ढूंढती हूँ जी-जान से
उन अक्षरों को,
शब्दों को,भावों को 
जुटाये थे जो.……
कितने जद्दो-जहद के बाद.…… 
लेकिन 
मालुम तो है आपको,
फिर से वही-वही बात 
नहीं बनती......
नामुमकिन होता है 
बार-बार 
कलम को मनाना,
चिरौरी-मिन्नतें करना,
जबरदस्ती लिखबाना.....तो 
क्षमा कीजियेगा....
रच नहीं पाती मैं 
एक ऐसी कविता जो 
खून को खौला दे..... 
शीशा को पिघला दे.….
बबाल मचा दे.…… 
मालुम तो है आपको 
हर एक की 
अपनी-अपनी सीमा होती है........  
   

13 comments:

  1. कभी कभी ऐसा होता है कि कुछ भी नही लिखा जाता । कविता हो या कहानी । लेकिन देखिये इस दशा को भी तो आपने एक कविता लिखकर ही व्यक्त किया है । असल में जो हमारे भीतर चल रहा है उसी की अभिव्यक्ति रचना बन जाती है इसे भी हर कोई कहाँ कर पाता है ।

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  2. खूबसूरत कथ्य...जबरदस्त रचना...

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  3. ज़बरदस्ती नहीं... ज़बरदस्त कविता है!!

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (28-04-2014) को "मुस्कुराती मदिर मन में मेंहदी" (चर्चा मंच-1596) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. रच नहीं पाती मैं
    एक ऐसी कविता जो
    खून को खौला दे.....
    शीशा को पिघला दे.….
    बबाल मचा दे.……
    मालुम तो है आपको
    हर एक की
    अपनी-अपनी सीमा होती है........

    rachnakar ki yehi chhatpathat to use srijan ki disha rachnea ko uksati hai...Tadap bani rahe taaki srijan ke naye phool khilen.

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  6. मालुम तो है आपको
    हर एक की
    अपनी-अपनी सीमा होती है....

    बिल्‍कुल सच ...हमेशा की तरह एक बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ..आभार ।

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  7. कविता अपनी मर्जी से आती है..तभी वह भाषा का फूल कहाती है.

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  8. जरूरी भी नहीं आपके कलम से ऐसा कुछ निकले .........जो लिखती हैं वही हमे बेहतरीन लगता है ........ !!

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  9. कभी कभी ऐसा भी होता है चाह कर भी कुछ खास लिख नही पाते..ये तो भाव है कभी कभी रुठ भी जाते है फिर मनाना पड़ता है फिर मान भी जाते है..

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  10. खूबसूरत भाव और शब्दो की जादूगिरी....वाह बहुत खूब

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  11. ☆★☆★☆



    रच नहीं पाती मैं
    एक ऐसी कविता जो
    खून को खौला दे.....
    शीशा को पिघला दे.….
    बबाल मचा दे.……
    मालुम तो है आपको
    हर एक की
    अपनी-अपनी सीमा होती है........

    वाह ! वाऽह…!

    और इस तरह आपने एक सुंदर रचना रच डाली
    आदरणीय मृदुला प्रधान जी
    हृदय से साधुवाद स्वीकार करें ।


    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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  12. हमें पसंद है आपकी ये सीमा और आपकी लेखनी। लिखते रहिये पढाते रहिये।

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  13. इरादा नेक होना चाहिए..राह अपने आप बन जाती है। अगर यह आपकी सीमा है, तो असीम क्या होगा?

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