Tuesday, November 8, 2011

जब टेढ़े-मेढ़े उल्टे-सीधे.......

जब टेढ़े-मेढ़े
उल्टे-सीधे
और
उलझे हुए.....
रिश्तों की कौमें 
निकलकर ,
एक -दूसरे की गवाही 
लेकर,
अपने-आपको स्थापित 
करने लगतीं हैं .......
जब नींव-रहित,
कच्चे-पक्के
संबंधों के अलाव,
भौतिक रस-विलास के 
सौजन्य से......
बढ़-चढ़ कर 
फैलने लगते हैं,
तब......
दूर से देखते हुए 
ठोस, 
भावनात्मक 
रिश्तों का वज़ूद,
क्रमश: 
खोने लगता है........
खोने लगता है,
स्नेह-सिंचित जड़ों से,
निश्छल कोमलता का
चिर-संचित
अभिमान.....
और
समय के धरातल पर,
उधड़ते  हुए
रिश्तों का,
धूल-धुसडित रेशमी डोर,
अपने होने  का
एहसास .......भर करा देता है,
या कहूं......... कि
'येन -   तेन-  प्रकारेण'
बहला देता है.......

34 comments:

  1. bahut sundar kavita mradula ji...rishton ke tane bane ko samjhne ke prayas jesi....

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  2. बहुत ही बढि़या ।

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  3. bahut achhe bhaawon ko likha hai aapne.

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  4. मृदुला जी इस खूबसूरत और भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  5. और
    समय के धरातल पर,
    उधड़ते हुए
    रिश्तों का,
    धूल-धुसडित रेशमी डोर,
    अपने होने का
    एहसास .......भर करा देता है,
    या कहूं......... कि
    'येन - तेन- प्रकारेण'
    Haan....bilkul sahee kaha!

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  6. वाह!भावपूर्ण अभिव्यक्ति!

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  7. भावनात्मक रिश्तों का आकाश बहुत बड़ा है!
    सुन्दर कविता!

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  8. येन - तेन- प्रकारेण'... zindagi isi bhasha me chalti hai

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  9. या कहूं......... कि
    'येन - तेन- प्रकारेण'
    बहला देता है......
    ktu satya.

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  10. बहुत खूब ......कुछ रिश्ते बेनाम होते हैं...फिर भी वो ख़ास होते है >

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  11. bahut bhaavpoorn sundar abhivyakti.

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  12. bahut sunder shilp saundary se rishto ki bagiya ki bakhiya ki hai.

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  13. उधड़ते हुए
    रिश्तों का,
    धूल-धुसडित रेशमी डोर,
    अपने होने का
    एहसास .......भर करा देता है,
    या कहूं......... कि
    'येन - तेन- प्रकारेण'
    बहला देता है.......

    bahut khoob
    www.poeticprakash.com

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  14. रिश्तों को पड़ताल करती यह कविता बहुत अच्छी लगी।

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  15. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

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  16. रिश्तों की जटिलता को वास्तविकता के तराजू पर तोलती यह कविता कहीं कहीं अपना ह्रदय खंगालने को बाध्य करती है!!

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  17. चिर-संचित
    अभिमान.....
    और
    समय के धरातल पर,
    उधड़ते हुए
    रिश्तों का,
    धूल-धुसडित रेशमी डोर,
    अपने होने का
    एहसास .......भर करा देता है!!

    aur fir ek naya jamn....!!

    ***punam***
    bas yun...hi...
    tumhare liye...

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  18. खुबसूरत भावपूर्ण रचना....

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  19. आज 10 - 11 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
    ____________________________________

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  20. बेहद सूक्ष्मता से रिश्तो का अवलोकन किया है।

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  21. रिश्तों पर लिखी बहुत भावनात्मक रचना ... ज़िंदगी से जुडी आपकी रचना बहुत पसंद आई

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  22. रिश्तों पर लिखी बहुत भावनात्मक रचना ... ज़िंदगी से जुडी आपकी रचना बहुत पसंद आई

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  23. सदा की तरह ही आपकी यह रचना भी ठहरने के लिये बाध्य करती है ।

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  24. ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.com/

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  25. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है कल शनिवार (12-11-2011)को नयी-पुरानी हलचल पर .....कृपया अवश्य पधारें और समय निकल कर अपने अमूल्य विचारों से हमें अवगत कराएँ.धन्यवाद|

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  26. समय के धरातल पर उधड़ते हुए
    रिश्तों का धूल धसरित रेशमी डोर ..
    अपने होने का अहसास .
    .रिस्तो का मर्म संजोती रचना

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  27. आपके पोस्ट पर आना सार्थक सिद्ध हुआ । पोस्ट रोचक लगा । मेरे नए पोस्ट पर आपका आमंत्रण है । धन्यवाद ।

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  28. मृदुला जी,..
    भावनात्मक रिश्ते की शूक्ष्मता से
    जीवन का निरीक्षण करती रोचक पोस्ट ...
    मेरे पोस्ट -वजूद- में स्वागत है .....

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  29. बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना...लाजवाब।

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  30. bahut sundar Mrudula ji
    sundar bhaavabhivyakti aur saarthak rachna !!

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  31. behad sundar rachna...
    last line bahut hi fabulous...

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  32. जब नींव-रहित,
    कच्चे-पक्के
    संबंधों के अलाव,
    भौतिक रस-विलास के
    सौजन्य से......
    बढ़-चढ़ कर
    फैलने लगते हैं,
    तब......
    आह ये रिश्तों के उलझे से जाल । बेहद भावपूर्ण और सुंदर भी ।

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