Thursday, November 11, 2010

विदेशी भारतीयों के नाम.......

तुम्हें बुलाने को हमने,
सावन से यूँ
बोला था...कि कह देना,
बारिश की बूँदें
गिरतीं हैं,
अपनी छत से होकर
हर दिन ,
तुम जिसे देखते रहते थे,
खिड़की पर बैठे,
हर पल -छिन.
सावन आँखों में
भरा हुआ,
लेकर जबाब यह
आया था, तुम
फव्वारों से उड़ती,
बूंदों  में खोकर,
अपना वह सावन
भूल गए.
मैं जाड़ों की शीत-लहरी को
समझाई थी,
जाकर कहना....कि
बैठ धूप में,
मूंगफली के दानों के संग,
गर्म चाय के
ग्लासों से,
तलहथियों को गरमा जाएँ.
तुमसे मिलकर,
कितने दिन तक,
मुझसे मिलने में
कतराई, फिर बोली थी ...
जब जाड़ों में,
बर्फ़ पड़ती है दिन-रात,
तुम अंदर बैठकर,
उन सफ़ेद खामोशियों को,
कर लेते हो,
आत्मसात और 
कि तुम अब,
शीत -लहरी को ,
नहीं पहचानते .
फिर फागुन को बुलवाई थी
कि जाओ,
याद दिला आओ,
होली के गीत,
सुना आओ, उन मालपूओं की
खुशबू पर,
इत्रों के नाम ,
गिना आओ...
लेकिन तुमसे मिल सका नहीं, 
तुम व्यस्त  थे वहां ,
आसमानी ख़्यालों में ,
ख्वाबों की उड़ानों में ,
परदेश की चालों में.
तुम्हारे सर पर था सवार,
'इस्टर' का सोमवार और 
फिर....आखिरी बार,
हमने,
भेजी थी वसंत .
तितलियों के पंखों पर,
फूलों की खुशबू लेकर कि
बता देना....फूलों के रंग ,
सुना आना कोयल की कूक 
लेकिन....... 
वहां 'स्प्रिंग' के,
बिना खुशबू वाले 
फूलों की पकड़ ,
तुम पर,
सख्त होती गयी ,
'कोलोन' का छिडकाव,
दिन-प्रतिदिन तुम्हें
जकड़ता गया, 
पतझड़ को 'ऑटम' से
बदलकर, तुमने मन को,
बहला लिया,
यहाँ के तीज-त्यौहार,
'क्रिसमस-ट्री' के
सितारों और लट्टूओं  पर
चढ़ा  दिया ......और
फिर  एक दिन.....
कंकरीट   के जंगल ने,
सोंधी मिट्टी की 
कोमलता पर,
ऐसा प्रहार किया कि
अलग हो गए 
तुम्हारे जड़ -मूल 
और बिना कुछ सोचे ,
झट से,
कसकर बांध ली, 
तुमने अपनी मुट्ठी 
क्योंकि...... मुट्ठी में,
तुम्हारा  'ग्रीन -कार्ड 'था . 
 

Thursday, October 28, 2010

नहीं चाहती ..........

नहीं चाहती ..........
तुम्हारी तस्वीर को 
माला पहना दूं ,
अगरबत्ती दिखा दूं ,
फूल चढ़ा दूं और
जो दूरी............
तुम्हारे-हमारे बीच
दुर्भाग्यवश,
बन गयी है,
उसे  और बढ़ा दूं.
नहीं चाहती.............
नियम-कानून से
बना-बनाकर
अनबूझ पहेलियाँ,
हल निकालूँ ,
सुनी-सुनायी
जहाँ-तहां की,
जिनकी-तिनकी,
मन में पालूँ
और
सोचने,चाहने,
याद करने की
अभ्यस्त
जिस छवि की,
उसे ही
बदल डालूँ.
प्रहार कर
अपनी छमता पर,
व्यथा को,
दिखाना नहीं चाहती........
यादों को सहेजने की,
कोई और पद्धति,
अपनाना नहीं चाहती........

Tuesday, October 19, 2010

माँ सरस्वती........

मणि माला धारण किये,
कर कमलों में
वीणा लिए,
हंस के सिंघासन पर
विराजती,
माँ सरस्वती.........
दे देना
वरदान,
एक ऐसी
विलक्षण शक्ति का
जो
भरती रहे स्फूर्ति,
सहज ही
मेरे तन मन में.
कर देना सराबोर,
एक ऐसी
भक्ति से,
जो
जागृत रखे,
मेरे चेतना को,
असीम
संतुष्टि से.
जगाये रखना
मेरे मन में,
निर्भय विश्वास का
मन-वांछित
उल्लास,
आप्लावित
करते रहना
मेरे विवेक को,
अपनी
सुदृढ़ क्षमताओं के
वरद
हस्त से,
तुम्हारे
आलौकिक प्रकाश के
माध्यम से,
सुगम होती  रहें
मेरी
जटिलतायें,
तुम्हारी
सौहाद्रता का अंकुश,
तेज धार बनकर           
तराशती रहें
मेरी
अनुभूतियों को,
अचिन्त्य रहे
मेरी भावनाओं में,
तुम्हारा
कोमल स्पर्श,
आभारित रहे
मेरे अंतर्मन का
पर्त-दर-पर्त, 
तुम्हारी
अनुकम्पाओं  से          
और
सुना सकूँ तुम्हें
जीवन भर,
कविताओं में भरकर,
तुम्हारे दिए हुए
शब्दों के पराग,
तुमसे मिली
आस्थाओं की
पंखुडियां
और
तुम्हारे स्वरों से
मुखरित,
अनगिनत
गुलाब.

Tuesday, October 12, 2010

तब मैं व्यस्त रहता था..........

तब मैं व्यस्त रहता था..........
यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ
और फिर वहाँ से वहाँ,
कुछ सुनता था,
कुछ नहीं सुनता था,
कुछ कहता था,
कुछ नहीं कहता था
पर तुम जो कहती थी,
कुछ प्यार-व्यार जैसा,
वो फिर से कहो न ।
मैं जगा-जगा सोता था,
मेरी पलकों पर
तुम, करवटें बदलती थी,
मैं जहाँ कहीं होता था,
तुम्हारी सांस,
मेरी
सांसों में, चलती थी ।
तुम आसमान में
सपनों के, बीज बोती थी,
अलकों पर
तारों की जमातें ढ़ूंढ़ती थी,
घूमता था मैं,
तुम्हारी कल्पनाओं के, कोलाहल में,
स्पर्श तुम्हारी हथेलियों का,
मेरे मन में कहीं,
रहता था ।
तुम शब्दों के जाल
बुन-बुनकर, बिछाती थी,
मैं जाने-अनजाने,
निकल जाता था,
तुम्हारे कोमल, मध्यम और
पंचम स्वरों का
उतार-चढ़ाव,
मैं कभी समझता था,
कभी नहीं समझता था,
तब मैं व्यस्त रहता था,
यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ
और फिर वहाँ से वहाँ,
कुछ सुनता था,
कुछ नहीं सुनता था,
कुछ कहता था,
कुछ नहीं कहता था,
पर तुम जो कहती थी,
कुछ प्यार-व्यार जैसा,
वो फिर से कहो न ।

Sunday, October 3, 2010

माज़ी के समानों में........

माज़ी के समानों में,

हमको भी
रखे रहना,
सीपी की डिब्बियों में,
हमको भी
रखे रहना.
बचपन
की किताबों पर
छापी हुई तितली में,
कागज़ के पुलिंदों को
बाँधी हुई डोरी में,
कंडे की कलम,
टिकिया, स्याही की
कोई सूखी,
कॉपी के फटे पन्ने,
तारीख़
तब की लिखी.
सिक्का कोई पुराना
छिट-पुट सी
पर्चियों में,
अबरख का एक टुकडा
अम्मा की चिट्ठियों में,
अंगूठियों से निकला,
कोई नगीना
तब का,
हुक्के की कोई
टोंटी
नाना की गुडगुडी का.
पॉकेट घडी से झूलती,
चेनों में रखे रहना,
आँखों के खारेपन में,
हम को भी
रखे रहना.
नुस्खा दवाईयों का
लिखा हुआ
पिता का,
दावात संगे-मर्मर
दादा के ज़माने का,
एक ज़ंग लगी
सुई,
एक रंग लगा
बटुआ,
झोले में रखा
डंडा, आजादी का
तिरंगा,
एक चाभियों का
गुच्छा,
एक सुर्ख लाल मोती,
धागों की
पोटली में,
छोटा का एक
चुम्बक...
चुम्बक के किनारों पर
हमको भी
रखे रहना
माज़ी के सामानों में,
हमको भी
रखे रहना...............

Tuesday, September 21, 2010

तारे फ़लक से.........

तारे फ़लक से
हमसे,
कहते हैं सर उठाओ
बेले की खुशब
आकर,
कहती है गुनगुनाओ
फूलों की टोलियाँ मिल ,
आ पास बैठतीं हैं ,
शाखें ,लताएँ अक्सर
कुछ देर
ठहरतीं हैं .
बIदल गगन से
हमसे,
कहता भरो उड़ानें ,
तितली मुझे बताती
कि
कैसे पंख तानें ,
कुंजों से रोज़ होकर,
आती हवाएं मिलने ,
पत्तों पे अटकी बूँदें भी
साथ -साथ
चलने .
फिर ................
धूप-छांव आते -जाते
पूछा करतें हैं ,
हिमगिरि के संदेसे आ
हिम्मत
भरते हैं,
फूलों कि क्यारी से
हर पौधे ,
बातें करतें हैं ,
हरी दूब, शबनम,पराग
सब,
दोस्त बने रहतें हैं .
चिड़ियों का कलरव
समझाता,
झरनों का ख़त
आता है,
नदियों से कल-कल
सागर से
उठ तरंग ,
बहलाता है .
कलियाँ हंसती ,
मुस्काती ,
कुछ-कुछ कहती
रहती है ,
सूरज कि किरणें
मुझपर ,
अपनी नज़रें रखतीं हैं.
गोधूलि का आसमान
आ,
हाल-चाल लेता है
और रात में
चाँद वहाँ से,
निगरानी रखता है.

Sunday, August 29, 2010

विश्वास जहाँ भरता था.......

विश्वास जहाँ भरता था
कुलाँचे,
ख़्वाबों के खज़ाने
खुलते थे,
हर मौसम में
आती थी बहार,
हर सीपी में
मोती,
मिलते थे.
हंगामा-ए-आलम(1) में
शौके -बेपरवा(2)
रहते थे,
बरवख्त असूदा,(3)
क़मर(4) और
खुर्शीद(5) की बातें,
करते थे.
शबनम के मोती
चुन-चुन कर ,
हम माला रोज़
बनाते थे,
ऐसे की किसी रियासत में,
राजा और रानी
रहते थे.
ये बातें तब की हैं
जबकि
आसमान
नीला होता था,
पानी का रंग पन्ने जैसा ,
रूबी जैसा मन,
रहता था.
रेशम के धागे,
उलझ-उलझ कर,
टूट गए और
लम्हे सारे बिखर गए,
सपनों से हम
ऐसे जागे कि
चलते-चलते फ़िसल गए.
रफ़ीके-राहे-मंज़िल(6) का
सुख गया,
यहाँ से,
हर औलांगार(7) फ़ीका,
अफ़सुर्दा,(8)
ताबे-रुख़(9) से,
दर्दे-निहाँ(10) उठाकर,
दिन-रात-दोपहर से,
ये साल चल रहा है,
छुपकर
मेरी नज़र से.

1 दुनिया का हंगामा , 2 निश्चिन्त रहने का शौक ,3 संतुष्ट , 4 चाँद , 5 सूरज , 6 सहयात्री , 7 घुमने -फिरने की जगह ,8 उदास ,9 चेहरे की चमक ,10 आतंरिक पीड़ा