Wednesday, June 13, 2012

सूर्यास्त कहते हैं हुआ.....

रंग की दहलीज पर 
उड़ती 
गुलालों की फुहारें,
लाल,पीली,जामनी
पनघट,
कनक के हैं किनारे.
दूर नभ के 
छोर पर,घट स्वर्ण का 
पानी,सिन्दूरी,
सात घोड़ों के सजे  
रथ से,किरण 
उतरी सुनहरी.
स्वर्ण घट में भरी लाली,
धूप थाली में 
सजा ली,
छितिज का आँचल 
पकड़कर 
एक चक्का लाल सा,
हौले से 
नीचे को गया,
'सूर्यास्त'
कहते हैं हुआ.

23 comments:

  1. बहुत खुबसूरत प्रस्तुति..मॄदुला जी..

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  2. सूर्यास्त का मनोहारी वर्णन...

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  3. वाह,,,, बहुत सुंदर मनोहारी प्रस्तुति,,,बेहतरीन रचना,,,,,

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: विचार,,,,

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  4. shabdon ka itna sundar prayo padh kar mukh se apne aap hi --Wah wah !nikal gaya
    behtreen rachna
    aabhaar
    poonam

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  5. सूर्योदय के बाद अब सूर्यास्त :) बहुत खूबसूरत रंग बिखेरती हैं आप अपने शब्दों से...

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  6. बहुत सुन्दर..............
    हमारी टिपण्णी कहाँ ढल गयी????

    सादर

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  7. ......बहुत ही सुंदर मनोभावों को समेटे.....मनभावन रचना।

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  8. वाह बहुत खूबसूरत हैं ये जीवन के रंग

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  9. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 14-06-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में .... ये धुआँ सा कहाँ से उठता है .

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  10. वाह मृदुलाजी ...इतना सुन्दर सूर्यास्त ...पहले कभी नहीं देखा ...!!!!!

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  11. प्रकृति का अदभुत सौन्दर्य

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  12. बढ़िया शब्द चित्र खींचा है आपने ...

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  13. सिंदूरी शाम सी बढ़िया रचना...
    सादर

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  14. धूप थाली में
    सजा ली,
    छितिज का आँचल
    पकड़कर

    गुनगुनी रचना उपमा की पराकाष्टा को छूती

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  15. सुंदर रचना !!

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  16. एक चक्का लाल सा,
    हौले से
    नीचे को गया,
    'सूर्यास्त'
    कहते हैं हुआ.

    सूर्यास्त का अद्भुत वर्णन.

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  17. वाह ...सिन्धुरी शाम आँखों में उतर आई ..

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