ईंट -पत्थरों से
जोड़-जोड़कर,
इकठ्ठा किया हुआ
वात्सल्य ,
खेत-खलिहानों की
लहलहाहट पर फैलाया हुआ
स्वाभिमान,
कल-कारखाने,व्यवसाय में
समाहित
गगनचुम्बी सपने
और
मजबूती से बंधी हुई,
सम्मिलित,
सम्मानित गरिमा का
संग्रह,
रिश्तों में घुलते हुए,
'मैं' की
प्रचुरता से
अपमानित होकर ,
स्नेह ,ममता ,त्याग ,
विश्वास
और
आशीर्वाद की जायदाद को ,
विस्मित
कर रही हैं .
खुद को सभ्य-
सुसंस्कृत कहनेवाले
लोगों ने ,
आनेवाली पीढ़ियों को,
एक नए
पर्यायवाची का उपहार
दे दिया है,
'एन्सेसट्रल-प्रोपर्टी' को
'एक भयानक शब्द 'का
दर्जा देकर
स्थापित कर दिया है .
Saturday, January 1, 2011
Monday, December 27, 2010
आत्मीयता से भरी बातों को........
आत्मीयता से भरी बातों को
"कुरियर" के सहारे,
मुझ तक पहुँचा दिया,
चलो अच्छा किया,
एक शिष्टाचार था
बाकायदा निभा दिया .
विश्वास और अविश्वास के
पलड़े में
झूलता हुआ
अंतर्द्वंद,
मौसम के ढलान पर
अप्रत्याशित परिस्थितियों का
सामना करते हुए,
अपेक्षाओं के मापदंड से
फिसलता गया,
विधिवत प्रक्रियाओं को
कार्यान्वित करना,
भूलता गया
और काट-छाँटकर
निकाले हुए समय ने ,
इस लाचार मनःस्थिति को
अपराध मानकर,
अपनी बहुमूल्यता का एलान
इस अंदाज़ में
किया
कि मुजरिम बनाकर,
हमें
कठघरे में
खड़ा कर दिया,
चलो अच्छा किया,
एक शिष्टाचार था
अपने ढंग से निभा दिया.
"कुरियर" के सहारे,
मुझ तक पहुँचा दिया,
चलो अच्छा किया,
एक शिष्टाचार था
बाकायदा निभा दिया .
विश्वास और अविश्वास के
पलड़े में
झूलता हुआ
अंतर्द्वंद,
मौसम के ढलान पर
अप्रत्याशित परिस्थितियों का
सामना करते हुए,
अपेक्षाओं के मापदंड से
फिसलता गया,
विधिवत प्रक्रियाओं को
कार्यान्वित करना,
भूलता गया
और काट-छाँटकर
निकाले हुए समय ने ,
इस लाचार मनःस्थिति को
अपराध मानकर,
अपनी बहुमूल्यता का एलान
इस अंदाज़ में
किया
कि मुजरिम बनाकर,
हमें
कठघरे में
खड़ा कर दिया,
चलो अच्छा किया,
एक शिष्टाचार था
अपने ढंग से निभा दिया.
Tuesday, December 21, 2010
मरुभूमि कितना.........
'मरुभूमि
कितना सूना लगता है.......'
अनायास ही
निकल गया था
मुंह से ,
जब 'आबू-धाबी' के
ऊपर से
'सूडान' जाने के लिए,
जहाज़ उड़ा था
और
नीचे 'सहारा डेज़र्ट'
उदास खड़ा था.
न कहीं पानी,
न कहीं हरियाली,
एकदम सन्नाटा
एकदम ख़ाली.
बात हो गयी थी
आई-गई,
बीस-बाईस साल में
मैं भी
भूल गई
पर
आज सुबह,
बाल झाड़ते हुए,
अवाक्
रह गई थी.........
'कितनी समानता है
मेरी आँखों में',
ख़ामोशी
रूककर
कह गई थी .
कितना सूना लगता है.......'
अनायास ही
निकल गया था
मुंह से ,
जब 'आबू-धाबी' के
ऊपर से
'सूडान' जाने के लिए,
जहाज़ उड़ा था
और
नीचे 'सहारा डेज़र्ट'
उदास खड़ा था.
न कहीं पानी,
न कहीं हरियाली,
एकदम सन्नाटा
एकदम ख़ाली.
बात हो गयी थी
आई-गई,
बीस-बाईस साल में
मैं भी
भूल गई
पर
आज सुबह,
बाल झाड़ते हुए,
अवाक्
रह गई थी.........
'कितनी समानता है
मेरी आँखों में',
ख़ामोशी
रूककर
कह गई थी .
Tuesday, December 14, 2010
मधुमय तुम्हारा हास.......
मधुमय तुम्हारा हास
मेरे मन का बसंत है,
सुमधुर तुम्हारे श्वासों का
आरोह – अवरोह,
मेरी कल्पना में,
मेरी प्रेरणा में,
कुसुम कली से सुरभित
तरूलता सी,
लिपटी हुई है
और इन आँखों की नमी,
सिर्फ तुम्हारी है ।
मेरे मन का बसंत है,
सुमधुर तुम्हारे श्वासों का
आरोह – अवरोह,
मेरी कल्पना में,
मेरी प्रेरणा में,
कुसुम कली से सुरभित
तरूलता सी,
लिपटी हुई है
और इन आँखों की नमी,
सिर्फ तुम्हारी है ।
Saturday, December 4, 2010
फैशन शो में.........
औंधे मुंह गिर गयी शर्म,
पल्लू बाहर
रोता था,
ध्वस्त हया की
सिसकी पर
जब ,
'कैट-वॉक' होता था.
कुछ ऐसे,कुछ वैसे
कपड़ों की
ताकत से , शायद........
मंच हिला था,
लज्जा की दीवारों पर,
कितना कीचड़
फैला था.
गीत की लय पर
वहां,
आँखों की पुतली
बोलती थी ,
धज्जियां
बेवाक फैशन की
चमक-कर,
डोलती थी,
कतरनें
फैशन-परस्ती से
बदन पर,
सज रहीं थीं,
थान-दर-थानों के
कपड़े
सरसराकर,
चल रहे थे .
पीढ़ियों की सीढ़ियों पर
रूढ़ियाँ थीं
सर झुकाए,
रेशमी पैबंद पर
ख़ामोश थीं,
धमनी-शिराएँ.
बत्तियों का था धुआं
और
शोख़ियों का
शोर था,
रोशनी के दायरों में,
चल रहा
एक होड़ था .
पारदर्शी था कोई,
बेखौफ़ था
उनका जुनून,
झिलमिलाती सलवटों पर,
रात ने
खोया सुकून.
थी कोई आंधी चली
या कि कोई,
तूफाँ रूका था,
देखता कोई ,कोई
आँखें
झुकाने में लगा था .
नए फैशन की
नुमायश पर
नया ,
नग़मा बजा था,
आँचल का
अभिमान कुचलकर,
'हॉल'
तालियों से गूँजा था.
पल्लू बाहर
रोता था,
ध्वस्त हया की
सिसकी पर
जब ,
'कैट-वॉक' होता था.
कुछ ऐसे,कुछ वैसे
कपड़ों की
ताकत से , शायद........
मंच हिला था,
लज्जा की दीवारों पर,
कितना कीचड़
फैला था.
गीत की लय पर
वहां,
आँखों की पुतली
बोलती थी ,
धज्जियां
बेवाक फैशन की
चमक-कर,
डोलती थी,
कतरनें
फैशन-परस्ती से
बदन पर,
सज रहीं थीं,
थान-दर-थानों के
कपड़े
सरसराकर,
चल रहे थे .
पीढ़ियों की सीढ़ियों पर
रूढ़ियाँ थीं
सर झुकाए,
रेशमी पैबंद पर
ख़ामोश थीं,
धमनी-शिराएँ.
बत्तियों का था धुआं
और
शोख़ियों का
शोर था,
रोशनी के दायरों में,
चल रहा
एक होड़ था .
पारदर्शी था कोई,
बेखौफ़ था
उनका जुनून,
झिलमिलाती सलवटों पर,
रात ने
खोया सुकून.
थी कोई आंधी चली
या कि कोई,
तूफाँ रूका था,
देखता कोई ,कोई
आँखें
झुकाने में लगा था .
नए फैशन की
नुमायश पर
नया ,
नग़मा बजा था,
आँचल का
अभिमान कुचलकर,
'हॉल'
तालियों से गूँजा था.
Thursday, November 25, 2010
टूटी हुई,जंग लगी......
टूटी हुई,जंग लगी
लोहे की
एक कड़ाही,
लुढ़की पड़ी है
मेरे घर के , पिछले कोने में .
कितनी होली-दिवाली
देख चुकी है ,
बनाए हैं कितने पकवान
वर्षों तक ,
धुल-धुल कर,सुबह-शाम
चमका करती थी,
कभी पूरी ,कभी हलवा
चूल्हे पर ही
रहती थी .
नित्य,
नए स्वाद का
निर्माण करती थी ,
तृप्ति के आनंद का
आह्वान,
करती थी.
टूटी हुई,जंग लगी
लोहे की
एक कड़ाही,
लुढ़की पड़ी है
मेरे घर के, पिछले कोने में........
आते-जाते
कभी-कभी
पड़ जाती है नज़र
उस कोने में,
थम जाता है समय,
सहम जाता है
मन ,
तैरने लगती है
हवाओं में, व्यथाओं की
टीस
और अचानक ,
घूम जाता है मेरी आँखों में,
अपनी
माँ का चेहरा.
लोहे की
एक कड़ाही,
लुढ़की पड़ी है
मेरे घर के , पिछले कोने में .
कितनी होली-दिवाली
देख चुकी है ,
बनाए हैं कितने पकवान
वर्षों तक ,
धुल-धुल कर,सुबह-शाम
चमका करती थी,
कभी पूरी ,कभी हलवा
चूल्हे पर ही
रहती थी .
नित्य,
नए स्वाद का
निर्माण करती थी ,
तृप्ति के आनंद का
आह्वान,
करती थी.
टूटी हुई,जंग लगी
लोहे की
एक कड़ाही,
लुढ़की पड़ी है
मेरे घर के, पिछले कोने में........
आते-जाते
कभी-कभी
पड़ जाती है नज़र
उस कोने में,
थम जाता है समय,
सहम जाता है
मन ,
तैरने लगती है
हवाओं में, व्यथाओं की
टीस
और अचानक ,
घूम जाता है मेरी आँखों में,
अपनी
माँ का चेहरा.
Monday, November 22, 2010
मेरे प्रवासी मित्र......
मेरे प्रवासी मित्र ,
तुम लौट क्यों नहीं आते ?
तुमने जो बीज बोए थे .....
आम -कटहल के ,
फल दे रहे हैं सालों से .
चढ़ाई थी जो बेलें
मुंडेरों पर ,
कबकी फैल चुकी हैं ,
पूरी छत पर.
शेष होने को है ....
तुम्हारे भरे हुए ,
चिरागों का तेल , रंग
दीवारों पर ,
तस्वीरों की,
धुंधलाने सी लगी है.
तुम्हारे आने के
बदलते हुए,
दिन ,महीने और साल ,
मेरी उंगलिओं की पोरों पर
फिसलते हुए ,
तंग आ चुके हैं.
कोने -कोने में सहेजा हुआ
विश्वास ,
दम तोड़ने लगा है
कमज़ोर पड़ने लगी है,
पतंग की डोर पर
तुम्हारा चढाया माँझा.
तुम्हारी चिठ्ठियों के
तारीखों की
बढती हुई चुप्पी ,
कैलेंडर के हर पन्ने पर,
हो रही है
छिन्न-भिन्न .
तुम्हारे आस्तित्व पर चढ़ा
स्वांत: सुखाय,
गूंजने लगा है
हज़ारों मील दूर से ........
फिर इस साल .
तुम्हारे समृध्दी की
तहों में ,
खोने लगा है ,
पिता का चेहरा
और
तुम्हारा यथार्थ
डूबने लगा है ,
तुम्हारी माँ के
गीले स्वप्नों में .......
मेरे प्रवासी मित्र ,
तुम लौट क्यों नहीं आते ? /
तुम लौट क्यों नहीं आते ?
तुमने जो बीज बोए थे .....
आम -कटहल के ,
फल दे रहे हैं सालों से .
चढ़ाई थी जो बेलें
मुंडेरों पर ,
कबकी फैल चुकी हैं ,
पूरी छत पर.
शेष होने को है ....
तुम्हारे भरे हुए ,
चिरागों का तेल , रंग
दीवारों पर ,
तस्वीरों की,
धुंधलाने सी लगी है.
तुम्हारे आने के
बदलते हुए,
दिन ,महीने और साल ,
मेरी उंगलिओं की पोरों पर
फिसलते हुए ,
तंग आ चुके हैं.
कोने -कोने में सहेजा हुआ
विश्वास ,
दम तोड़ने लगा है
कमज़ोर पड़ने लगी है,
पतंग की डोर पर
तुम्हारा चढाया माँझा.
तुम्हारी चिठ्ठियों के
तारीखों की
बढती हुई चुप्पी ,
कैलेंडर के हर पन्ने पर,
हो रही है
छिन्न-भिन्न .
तुम्हारे आस्तित्व पर चढ़ा
स्वांत: सुखाय,
गूंजने लगा है
हज़ारों मील दूर से ........
फिर इस साल .
तुम्हारे समृध्दी की
तहों में ,
खोने लगा है ,
पिता का चेहरा
और
तुम्हारा यथार्थ
डूबने लगा है ,
तुम्हारी माँ के
गीले स्वप्नों में .......
मेरे प्रवासी मित्र ,
तुम लौट क्यों नहीं आते ? /
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