Monday, February 7, 2011

तन्हाई में यूँ ही बैठे.....



आप सब जाने-अनजाने पाठकों को मन से धन्यवाद देती हूँ, जो  मेरी कवितायेँ पढ़कर, समय -समय पर अपनी बेबाक टिप्पणी से उसे सजाते-संवारते  रहते हैं. आपके  सहयोग का सुख अमूल्य है और लगातार प्रेरित करती रहती है कुछ लिखने के लिए......

'तन्हाई में यूँ ही बैठे,
जब
याद हमारी
आ जाये.....
मीठी यादों को
जोड़-जोड़,
अलकों में
भरकर स्नेह प्रिय,
मेरा मन रखने को
इतना
तुम कर देना......
तुम हँस देना.
सागर में जब
लहरें गायें,
बागों में
कलियां मुस्कायें,
बादल के पीछे
इन्द्रधनुष,
अपनी आभा जब
बिखरायें,
ऐसे में
खो स्मृतियों में.....
सौरभ का कर एहसास प्रिय,
मेरा मन रखने को
इतना
तुम कर देना.....
तुम हँस देना ।
गोधूलि की
आहट को सुन,
जब पक्षी
कलरव कर जायें,
नभ के आँगन में
छिटपुट से,
कुछ तारे भी जब
खिल जायें,
ऐसे में
स्मित हास लिये,
पलकों पर
रखकर प्यार प्रिय,
मेरा मन रखने को
इतना
तुम कर देना.....
तुम हँस देना.'

40 comments:

  1. मेरा मन रखने को
    इतना
    तुम कर देना.....
    तुम हँस देना.'

    how swwweeeet.......itni pyara innocent sa thought....lovely :)

    ReplyDelete
  2. मेरा मन रखने को
    इतना
    तुम कर देना.....
    तुम हँस देना.'
    bahut hi masoom khyaal hain, bahut khoobsurti se likha hai

    ReplyDelete
  3. तुम हँस देना.
    सागर में जब
    लहरें गायें,
    बागों में
    कलियां मुस्कायें,
    बादल के पीछे
    इन्द्रधनुष,
    अपनी आभा जब
    बिखरायें,


    खूबसूरत एहसासों और ख्वाहिश को सरलता से शब्दों में पिरोया है.

    सादर

    ReplyDelete
  4. रचना, हर बार की तरह,

    साधुवाद.

    ReplyDelete
  5. वाह!!!!क्या लिखती हैं मेडम बहोत खूब!!!

    ReplyDelete
  6. मिठास से भरी हुई रचना।
    पसंद आई। बधाई।

    ReplyDelete
  7. वाह ...बहुत ही खूबसूरत शब्‍द ।

    ReplyDelete
  8. कोमल भावों से सजी ..
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

    ReplyDelete
  9. वसन्त की आप को हार्दिक शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  10. मेरा मन रखने
    इतना तुम कर देना
    तुम हँस देना
    बहुत सुन्दर ...ह्रदय से निकली रचना

    ReplyDelete
  11. "तन्हाई में यूँ ही बैठे,/जब /याद हमारी / आ जाये...../ मीठी यादों को/ जोड़-जोड़,/ अलकों में / भरकर स्नेह प्रिय,/ मेरा मन रखने को/ इतना / तुम कर देना....../ तुम हँस देना..'- एक सामान्य सा आग्रह, पर अपने आप में अनुपम. बधाई स्वीकारें- अवनीश सिंह चौहान

    ReplyDelete
  12. मीठी यादों को/जोड़-जोड़,/अलकों में/भरकर स्नेह प्रिय,/मेरा मन/रखने को/इतना/तुम कर देना....../तुम हँस देना.

    कितना विनम्र और प्यार भरा निवेदन है ...बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  13. मेरा मन रखने को
    इतना
    तुम कर देना.....
    तुम हँस देना.'
    वाकई खुबसूरत प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  14. बहुत विनम्र निवेदन और खुबसूरत प्रस्तुति|

    आप को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ|

    ReplyDelete
  15. इतने खूबसूरत नज़ारों को साक्षी बनाकर जब इस तरह मनुहार करे तो कोई कैसे नहीं हँसेगा.. इस हँसने के अनुरोध पर गुलज़ार साहब की नज़्म याद आ गई.. मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा...!
    मृदुला जी पूरे लय में एक बेहतरीन कविता!!

    ReplyDelete
  16. मेरा मन रखने को
    इतना
    तुम कर देना.....
    तुम हँस देना ।

    कोमल अहसासों को समेटे बेहद खूबसूरत रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  17. pyaar ke meethe ahsas se bahri kavita....

    ReplyDelete
  18. मेरा मन रखने को
    इतना
    तुम कर देना.....
    तुम हँस देना.'

    बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति.मन को स्पर्श करती हुई.
    ढेरों शुभ कामनाएं.

    ReplyDelete
  19. sundar aur bhavpoorn abhivyakti....
    khoosoorat...

    ReplyDelete
  20. smiles for you ma'am :) :) :)
    few more :) :) :)
    lovely penning!

    ReplyDelete
  21. बहुत खुबसुरत रचना जी धन्यवाद

    ReplyDelete
  22. मुस्कुरा देने और हंस देने का बहुत ही अच्छा निवेदन...सब को मुस्कुराना चाहिए....

    ReplyDelete
  23. "....तुम हँस देना!"
    मासूम सी अभिलाषा से भरा निवेदन, सुन्दर है! वसंत पंचमी की आप एवं आपके पाठक जनो को शुभकामानयें!

    ReplyDelete
  24. मृदुला जी,

    बहुत सुन्दर प्रेम से सराबोर पोस्ट है......बहत खूब|

    ReplyDelete
  25. मेरा मन रखने को
    इतना
    तुम कर देना.....
    तुम हँस देना....
    कोमल अहसासों से भरी बस इतनी सी तो चाहत है... बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति.मन को स्पर्श करती हुई.

    ReplyDelete
  26. आपको वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  27. बहुत सुन्दर , भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।
    बधाई मृदुला जी ।

    ReplyDelete
  28. मन रखने को हँस देना .....
    यही तो जीवन जीने का आधार है .....

    बहुत सुन्दर ...!!

    ReplyDelete
  29. भावपूर्ण अभिव्यक्ति ..
    ..मन को स्पर्श करती हुई.बहुत सुन्दर..

    ReplyDelete
  30. स्मित हास लिये,
    पलकों पर
    रखकर प्यार प्रिय
    भावपूर्ण.. खुबसूरत प्रस्तुति..

    ReplyDelete
  31. आद. मृदुला जी,
    प्रेम और समर्पण का अनमोल धरोहर है आपकी कविता !
    धाराप्रवाह भावों का प्रभावी सम्प्रेषण कविता को पूर्णता प्रदान करता है !
    साधुवाद !

    ReplyDelete
  32. Hi..

    Etne sahaj, saral bhavon se..
    koi priyvar ko kah paaye..
    hansna kya kshan do kshan ka fir..
    wo to hardam hi muskaaye..

    Kavita padhkar anjaane hi..
    hum bhi bas muska baithe hain..
    sneh akinchan se tere hum..
    Man apna harsha baithe hain..

    Meethi si kavita...

    Shubhkamnaon sahit..

    Deepak..

    ReplyDelete
  33. mridula ji
    kitni khoobsurati avam masumiyat liye hue priytam se yaadon ko sambhal rakhne ka anurodh.man ko puri tarah se bhigo gai.ek pyara komal ahsaas jise koi bhi thukra na sake .
    behatreen.
    avam bhav-bhini prastuti.
    hardik dhanyvaad---
    poonam

    ReplyDelete
  34. हद है ..... इस ब्लॉग पर मैं पहले क्यों नहीं आया !

    ReplyDelete
  35. मृदुला जी!
    बाहुत अच्छा लिखा। तन्हाई................क्या चीज है............सब कुछ,,,,,,,,,,,,,,,,कुछ नहीं।


    एक निवेदन-
    मैं वृक्ष हूँ। वही वृक्ष, जो मार्ग की शोभा बढ़ाता है, पथिकों को गर्मी से राहत देता है तथा सभी प्राणियों के लिये प्राणवायु का संचार करता है। वर्तमान में हमारे समक्ष अस्तित्व का संकट उपस्थित है। हमारी अनेक प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं तथा अनेक लुप्त होने के कगार पर हैं। दैनंदिन हमारी संख्या घटती जा रही है। हम मानवता के अभिन्न मित्र हैं। मात्र मानव ही नहीं अपितु समस्त पर्यावरण प्रत्यक्षतः अथवा परोक्षतः मुझसे सम्बद्ध है। चूंकि आप मानव हैं, इस धरा पर अवस्थित सबसे बुद्धिमान् प्राणी हैं, अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि हमारी रक्षा के लिये, हमारी प्रजातियों के संवर्द्धन, पुष्पन, पल्लवन एवं संरक्षण के लिये एक कदम बढ़ायें। वृक्षारोपण करें। प्रत्येक मांगलिक अवसर यथा जन्मदिन, विवाह, सन्तानप्राप्ति आदि पर एक वृक्ष अवश्य रोपें तथा उसकी देखभाल करें। एक-एक पग से मार्ग बनता है, एक-एक वृक्ष से वन, एक-एक बिन्दु से सागर, अतः आपका एक कदम हमारे संरक्षण के लिये अति महत्त्वपूर्ण है।

    ReplyDelete
  36. बेहतरीन रचना ....शुभकामनायें !

    ReplyDelete