Thursday, February 17, 2011

कल रात भर.........

दूब पर
शबनम की चादर  
थी बिछी,
छींटे पड़े
पत्तों पे थे,
थी पंखुरी के
भाल पर,
मोती जड़ी
कि ओस इतना
था गिरा,
कल रात भर.........

33 comments:

  1. us os ne itni baaten ki ... ki main nam hoti rahi, dubon se use uthaati rahi ... kuch aise hi ehsaas lage

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  2. sundar kavita.................
    mam please visit my new blog-- www.aclickbysumeet.blogspot.com .....................and give your comments on the blog......tell how you feel to see it....thanks..

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  3. भीगे से एहसास में मैं भी भीग गयी.-
    बहुत सुंदर कोमल रचना

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  4. ओस की बूँद के होश खो जायेंगे अपने बारे में ये कविता पढ़ के...
    छोटा मगर अच्छा.

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  5. बहुत खुब सुरत जी धन्यवाद

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  6. Hi..

    Raat bhar tha oos ka..
    Padna nirantar hi raha..
    Aur wo maidan main..
    dubon ke upar dikh raha..
    Motiyon si oos ki buoden..
    Rahen dikhti jahan..
    Koi jo chhu bhi le to..
    Dikhte kadmon ke nishan..

    Sundar bhav..

    Deepak..

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  7. andhere mein chamak utha hai chasm e nam koi
    jyun sitaron se tapki ho shabnam koi

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  8. kavita chhoti hai magar bhavpoorn hai.

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  9. बहुत खुब सुरत कविता| धन्यवाद|

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  10. बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ।

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  11. बहुत सुन्दर लिखा आपने...बधाई.


    ______________________________
    'पाखी की दुनिया' : इण्डिया के पहले 'सी-प्लेन' से पाखी की यात्रा !

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  12. सुंदर ओस के मोती सी कविता ।

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  13. कुछ हल्‍की फुल्‍की नहीं है, खली हे जि‍न्‍दगी
    सांस सांस लड़खड़ायी, चली है जि‍न्‍दगी


    स्‍त्री को नमन करती एक रचना http://rajey.blogspot.com/ पर

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  14. kuchh oss ki bunde shabd ban kar yahan bhi baras pade..:)

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  15. और.... कविता ओस पर बिखरी स्वप्निल किरणों की तरह चमक उठी !
    बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति !

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  16. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (19.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  17. .

    की ओस इतना था गिरा कल रात भर .....

    वाह ! मृदुला जी ...मन भीग गया इस सुन्दर अभिव्यक्ति से ..

    .

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  18. सुंदर कोमल एहसास

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  19. ....और उन ओस की बूदों पर ज्यों ही किरणें हुईं आशिक
    शर्मा के छुप गयीं वे जाने किधर, अब रात को ही आयेंगी नजर...

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  20. दूब पर
    शबनम की चादर
    थी बिछी,
    छींटे पड़े
    पत्तों पे थे,
    थी पंखुरी के
    भाल पर,
    मोती जड़ी
    कि ओस इतना
    था गिरा,
    कल रात भर.........

    बेहद ही उम्दा।

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  21. वाह! मुट्ठी में एक दुनिया को समेट लिया इस रचना ने.

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  22. is se zyaada short and sweet nazm maine kabhi nahin padhi....awwwesome...!!

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  23. एक सजीव चित्र मानस पटल पर उभर आया...
    ... बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  24. अद्भुत - गागर में सागर - आभार

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  25. Os ki choti choti boondon ko jeevan se bhar diya hai in panktiyon ne ... lajawaab ...

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  26. ओस इतना था गिरा कल रात भर .. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

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  27. os ka asthai astitav magar phir bhi bhav bibhor kar deta kshnaik kshan me ,ati uttam .

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  28. दुनिया को समेट लिया इस रचना ने

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  29. शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
    सूचनार्थ

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