Tuesday, February 15, 2011

"तुम सुबह की चाय सी.......

आज मन में आया कि कुछ अलग लिखते हैं और नतीज़ा ........
"तुम सुबह की चाय सी
गरमा-गरम,
बिस्कुट हो
'गुड-डे',
तुम 'डबल' अंडे का
'ऑमलेट',
तुम 'ट्रिपल' 'आइस-क्रीम'
'सन्डे'.
तुम समोसा हो
मटर का
और जलेबी रस भरी,
तुम ही हो
कुल्फी-फ़लूदा,
तुम ही हो
गुझिया परी.
तुम ह्रदय के कुञ्ज में
काजू की कतली,
मूंगफली हो,
तुम पराठों पर फिसलती
गुड़ में
मक्खन की डली हो.
दाल का
तड़का हो तुम,
सिगड़ी सिकी रोटी
कराड़ी,
तुम कचौड़ी हो
उड़द  की
और
चटनी खूब सारी.
तुम ही हो भरवाँ करेला,
तुम हो
शलगम का अचार,
तुम हो
सीताफल की सब्ज़ी,
तुम ही हो
शरबत-अनार.
तुम मेरी कोफ्ता-करी
पालक-पनीर,
तुम हो बिरयानी
तुम ही
चावल की खीर,
अब सुनो.....
मेरी बालूशाही....
ऐ मेरी छोले-भटूरे......
तुम हो
देशी घी का
हलवा,
हो गए
हर ख़्वाब पूरे."



35 comments:

  1. अलग लिखने का नतीजा यही निकला कि मन में समंदर और मुंह में पानी आ रहा है ........सुन्दर

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  2. ललचा गया मन कि तुम कुछ और नहीं ......पूरी प्रकृति तुममे समाई है .....तभी तो यह सारी प्यारी सी चीजें बन पायी हैं ..

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  3. इतने व्यंजनों के स्वाद ने निशब्द कर दिया..बहुत सुन्दर

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  4. वाह...तुम क्या हो "काके दे ढाबे" का मीनू हो...

    नीरज

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  5. बहुत सुन्दर रचना मूँह मे पानी ले आई।

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  6. वाह मृदुलाजी !

    रसोई के स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ-साथ ढाबों के पकवानों और अनेकानेक मन तृप्त करने वाली चीज़ों जैसा प्यारा तो

    कोई खास ही हो सकता है | बड़ी मनमुग्धकारी rachna है |

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  7. वाह ...बहुत खूब कहा है आपने इस रचना में ।

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  8. ये तो मास्टर शेफ ने बनाया है ... स्वादिष्ट

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  9. ऊऽऽ यम्मी यम्मी !!

    मृदुला जी
    सस्नेहाभिवादन !

    आज की कविता पढ़ते ही मुंह में पानी भर आया …
    अगर ऐसी शख़्सियत सामने हो तो कौन न निगल जाना चाहेगा … :)


    ♥ प्रेम बिना निस्सार है यह सारा संसार !
    ♥ प्रणय दिवस की मंगलकामनाएं! :)

    बसंत ॠतु की भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  10. वाह मृदुला जी,
    गजब की कविता रची है।

    आभार

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  11. kavita me jaan daal di..........pura menu aa gaya hai...:)

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  12. वाह वाह ! लगता है आप भी खाने पीने की शौक़ीन हैं, मगर जरा सम्भल के ! कहीं आपके यहाँ फोलोअरस् की भीड़ न लग जाये !

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  13. Kya raseeli rachana hai! Ye to achha hai ki kewal padhnese wazan nahee badhta!

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  14. आदरणीय मृदुला जी,
    नमस्कार !
    वाह ...बहुत खूब कहा है
    इस कविता का तो जवाब नहीं !

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  15. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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  16. वाह! बड़ी ही मिठास भरी इसे तो पढ़ते ही खा जाने का मन कर रहा है:)

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  17. मुंह में पानी लाने वाली सुन्दर रचना| धन्यवाद|

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  18. आदरणीया मृदुलाजी नमस्ते |बहुत ही ताजगी से भरी कविता नया कंटेंट देखने को मिला बहुत बहुत बधाई |

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  19. वाह मृदिला जी,क्या कविता परोसी है आपने.
    लाजवाब

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  20. • ताज़ा बिम्बों-प्रतीकों-संकेतों से युक्त आपकी भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं, जीवन की तहों में झांकने वाली आंख है। इस कविता का काव्य-शिल्प हमें सहज ही कवयित्री की भाव-भूमि के साथ जोड़ लेता है।

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  21. पढते-पढते ही लार सी टपकने लगी है ।

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  22. आज की रचना तो बहुत मिठ्टी लगी जी सथ मे चटपटी भी, धन्यवाद

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  23. waah , itni cheezein ek saath kaise khayenge mridula ji

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  24. This comment has been removed by a blog administrator.

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  25. मृदुला जी,

    माफ़ कीजिये मुझे आपकी ये रचना स्तरीय नहीं लगी.......जैसे आपकी अन्य
    रचनाएँ होती है उसके बराबर ये कहीं नहीं टिकती......पर कुछ नया करने के लिए शुभकामनायें|

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  26. achchha hai ye non-veg and vegetarian dishes.
    kamal ka sanyojan...bahut badhiya....dhanyabad..

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  27. अब इतने सारे स्वदिष्ट व्यंजन की याद कराएंगी तो कविता तो मजेदार लगेगी ही ....
    वाह ... मज़ा आ गया पढ़ कर इसे ..

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  28. .

    Very delicious poetry !

    Smiles !

    .

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  29. वाह मृदुला जी आपको खाने में और क्या क्या पसंद है ...

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  30. वाह इतनी स्वादिष्ट कविता पहले नहीं पढ़ी कभी. हालाँकि ये भी सच है कि इस रचना में वो गहराई नहीं है जो आम तौर पर आपकी अन्य कविताओं में होता है. फिर भी पढ़ना सुखद रहा.

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  31. इतना कुछ .वाह वाह बहुत सुंदर ....!!
    इससे ज्यादा कौन चाहेगा .
    बहुत सुंदर रचना

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