Friday, July 24, 2009

ए़क सुबह .........

दूब पर शबनम की चादर थी बिछी,

छींटे पडे पत्तों पे थे ,

थी पंखुरी के भाल पर मोती जडी

कि ओ़स इतना था गिरा

कल रात भर ...........

7 comments:

  1. very nice poem, do post more.

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  3. बेहतरीन
    कल 06/06/2012 को आपके ब्‍लॉग की प्रथम पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    '' क्‍या क्‍या छूट गया ''

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  4. इस भरी गर्मी में....
    ठण्डक का अहसास
    मृदुला जी की मृदुल कविता
    सादर

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