Tuesday, January 7, 2014

कहा था मैंने उस दिन बुखार से.....

कहा था मैंने उस दिन 
बुखार से......
चले जाओ,लेकिन 
गया कहाँ ?
मैं बोली,
छुप  जाओ कम- से- कम 
अकेली हूँ,
बच्चे परेशान  हो जाते हैं,
इधर छुट्टी,उधर छुट्टी ,
भाग-दौड़,
झमेला महसूस करती हूँ.
ऐसा करो,
जो मन नहीं भरा 
तो आ जाना,
जब मेरे पति आ जाएँ.....
चाहे रह लेना 
दो-चार दिन,
वो संभाल लेंगे,
दवा-ववा पिलायेंगे 
देख-भाल लेंगे....और 
आ गया बुखार,
सुबह पति,शाम में बुखार.
अरे,इतनी जल्दी क्या थी,
चाहे नहीं ही आते,
क्या फ़र्क पड़ जाता....
कसैली सी जीभ है 
ढ़ीला-ढ़ीला मन....... पर 
तुम्हें क्या.....
आ गए एकदम  
बुखार बोला,
मुझे तुम्हारी फ़िक्र है 
इसीलिए तो 
आया हूँ,
देख गया था 
बच्चों का लाया हुआ 
'हॉर्लिक्स,'केक','एपल',
'पाइन-एपल',
पैकेट भर अंजीर,
हरी-हरी 
पिस्ते की बरफी 
करती रही अधीर.....
मैं देख गया था 
इसीलिए तो 
आया हूँ....
तुम मुझे खिलाओ 
मुझे पिलाओ,
ताकत तुमको दे दूंगा,
कौन यहाँ रहने आया हूँ,
खा-पीकर   
खुद ही चल दूंगा.......  

Thursday, January 2, 2014

सहिष्णुता के आवरण में......

सहिष्णुता के
आवरण में
ज्ञान-विज्ञान से
अन्याय की त्रासदी को
ललकारकर......
आत्मबल के आभूषण से
सुसज्जित
ईंट-पत्थरों के बीच
कंक्रीट सी.....
कोमलांगिनी की सशक्त
उँगलियों ने
पकड़ ली है
समय की रफ़्तार......
तकनिकी ज्ञान के
माध्यम से
खोलती  हुई हर द्वार......
नए-नए आयाम
बनाती है,
शिखर पर झंडे
लगाती है,
यह आज की नारी है......
हर जगह
पहुँच जाती है........

Wednesday, January 1, 2014

चूड़ियों की खनक है........

सूक्ष्म कन्धों पर 
दायित्व का 
जहाज़  लिए…… 
अडिग पैरों के
संतुलन
और
असीमित भुजाओं के
अनुशासन से,
श्रम का
योगदान कर....... 
परिवार को सींचती,
स्वाभिमान के
गौरव को
सहेजती-संभालती,
यह आज की नारी है.......
इसमें
एक अलग ही
चमक है....... 
विकास के
हर आँगन में,
अब
चूड़ियों की खनक है........ 

Saturday, December 14, 2013

तथाकथित 'फैशन शो' से निकलकर जो मुझे याद रहा……… (काफी पहले 'कादम्बिनी' में छपी थी )

औंधे मुँह गिर गयी शर्म
पल्लू बाहर रोता था,
ध्वस्त हया की
सिसकी पर, जब
'कैट-वॉक' होता था.…… 
कुछ ऐसे कुछ वैसे
कपड़ों की
ताकत से , शायद........
मंच हिला था,
लज्जा की दीवारों पर,
कितना कीचड़
फैला था........ 
गीत की लय पर वहाँ
आँखों की पुतली
बोलती थी,
धज्जियां
बेवाक फैशन की
चमक-कर,डोलती थी…....
कतरनें
फैशन-परस्ती से
बदन पर,सज रहीं थीं,
थान-दर-थानों के कपड़े
सरसराकर,चल रहे थे .……
पीढ़ियों की सीढ़ियों पर
रूढ़ियाँ थीं
सर झुकाए,
रेशमी पैबंद पर
ख़ामोश थीं,धमनी-शिराएँ........
बत्तियों का था धुआं
और
शोख़ियों का शोर था,
रोशनी के दायरों में,
चल रहा  
एक होड़ था.......
पारदर्शी था कोई,बेखौफ़ था
उनका जुनून,
झिलमिलाती सलवटों पर,
रात ने
खोया सुकून.…… 
थी कोई आंधी चली
या कि कोई,तूफाँ रूका था,
देखता कोई ,कोई
आँखें
झुकाने में लगा था ……। 
नए फैशन की
नुमायश पर नया
नग़मा बजा था,
आँचल का
अभिमान कुचलकर,
'हॉल'
तालियों से गूँजा था........ 

Monday, November 25, 2013

सोलवां साल.......यानि.......

सोलवां साल.......यानि 
एक जादू ,एक आकर्षण,
एक निमंत्रण.....
कुछ अलग सा मिजाज़........
तो मेरी बच्ची,
अब करनी होगी तुम्हें 
अपने ही
कदमों की पहरेदारी 
समझदारी से.....कि
दुनियादारी में 
प्रलोभन कम नहीं.
सशक्त मन से, 
उज्जवल भविष्य का 
आह्वान करना,
शालीनता से,विनम्रता से,
प्रभु का 
ध्यान करना,
कहना.......
तुम्हें विद्या,बुद्धि,विवेक से 
आभूषित के दें,
कहना........
तुम्हें धैर्य से,प्रेम से,विश्वास से 
आलोकित कर दें.........

Saturday, November 23, 2013

जाड़ों में प्रायः
दिख जाते हैं, वृद्ध-दंपत्ति, 
झुकी हुई माँ ,कांपते हुए
पिता.....धूप सेकते हुए.....
कभी 'पार्क'में,कभी
'बालकनी'में,
कभी 'लॉन' में
तो कभी'बरामदों' में.
मोड़-मोड़कर
चढ़ाये हुए 'आस्तीन'
और
खींच-खींचकर
लगाये हुए'पिन' में
दिख जाता है.......वर्षों से
विदेशों में बसे,
उनके धनाढ्य बाल-बच्चों का
भेजा हुआ,
बेहिसाब प्यार .
ऊल-जलूल ,पुराने,शरीर से
कई गुना बड़े-बेढंगे
कपड़ों का
दुःखद सामंजस्य,
सुदूर........किसी देश में
सम्पन्नता की
परतों में
लिपटी हुई नस्ल को,
धिक्कारती.......
ठंढ से निश्चय ही बचा लेती है,
इस पीढ़ी की सामर्थ्य को
संभाल लेती है........लेकिन
कृतघ्नता  के आघात की
वेदना का
क्या......
आपसे अनुरोध है......
इतना ज़रूर कीजियेगा,
कभी किसी देश में
मिल जाये वो नस्ल......तो
इंसानियत का कम-से कम
एक पर्चा,
ज़रूर
पढ़ा दीजियेगा.......... 

Wednesday, November 20, 2013

मेरी मदर इन लॉ कहती थीं……कि अपने ज़माने में वो पापड़ दाल में भिंगोकर खाती थीं ताकि बाहर उनके खाने की आवाज़ सुनायी न दे. सोचती हूँ ,तब की  औरतोँ में  संकोच और लज्जा का   कितना अलग रूप था……