Sunday, October 3, 2010

माज़ी के समानों में........

माज़ी के समानों में,

हमको भी
रखे रहना,
सीपी की डिब्बियों में,
हमको भी
रखे रहना.
बचपन
की किताबों पर
छापी हुई तितली में,
कागज़ के पुलिंदों को
बाँधी हुई डोरी में,
कंडे की कलम,
टिकिया, स्याही की
कोई सूखी,
कॉपी के फटे पन्ने,
तारीख़
तब की लिखी.
सिक्का कोई पुराना
छिट-पुट सी
पर्चियों में,
अबरख का एक टुकडा
अम्मा की चिट्ठियों में,
अंगूठियों से निकला,
कोई नगीना
तब का,
हुक्के की कोई
टोंटी
नाना की गुडगुडी का.
पॉकेट घडी से झूलती,
चेनों में रखे रहना,
आँखों के खारेपन में,
हम को भी
रखे रहना.
नुस्खा दवाईयों का
लिखा हुआ
पिता का,
दावात संगे-मर्मर
दादा के ज़माने का,
एक ज़ंग लगी
सुई,
एक रंग लगा
बटुआ,
झोले में रखा
डंडा, आजादी का
तिरंगा,
एक चाभियों का
गुच्छा,
एक सुर्ख लाल मोती,
धागों की
पोटली में,
छोटा का एक
चुम्बक...
चुम्बक के किनारों पर
हमको भी
रखे रहना
माज़ी के सामानों में,
हमको भी
रखे रहना...............

35 comments:

  1. ऐसे कितने ही सामान हैं जो यादों से जुड़े होते हैं ...जोड़ने वाले की जैसे सारी पूंजी ही होते हैं ..एक खजाना शायद ....औरों के लिए बेकार की चीज़ें ....इस रचना से आपने कितनी ही चीज़ों की याद दिला दी ...सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. क्या कहा जाये रचना के बारे में....कितनी यादें ताज़ी कर दीं....बहुत ही भावनात्मक अभिव्यक्ति...आभार...

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  3. ateet se jude anmol kazane ko usakee yado ko hamare sath batne ke liye tahe dil se shukriya .

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  4. अतीत की यादों से जुडी हर चीज़ बेश-कीमती होती है...और उन के साथ जो भावनात्मक रिश्ता होता है...वो कुछ ऐसा ही होता है.
    बहुत भावपूर्ण रचना.

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  5. माज़ी के सामानों में,
    हमको भी
    रखे रहना...............

    बहुत ही भावनात्मक अभिव्यक्ति...
    आभार.

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  6. बहोत ही अच्छी कविता

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  7. हमको भी! हमको भी!
    मृदुला जी,
    स्वाद आया!
    आशीष
    --
    प्रायश्चित

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  8. bahut hi bhavnatmakta se paripurn aapki rachna ne jhakjhr kar rakh diya .bahut hibadhiya prastuti.
    poonam

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  9. मृदुला जी, हमरा बेटा यह सब समेटकर रखे हुए है जिसका जिकिर आप अपने कविता में की हैं. और इसलिए आपका यह कबिता हमरे लिए अनमोल है. जेतना जतन से मेरा बेटा सबकुछ हिफाज़त से रखे है, हमको उम्मीद है कि ऊ हमलोग का याद भी समेटकर रख सकेगा.
    आपका यह रचना अनमोल है, खासकर हमारे लिए. हमरा नमन सुइकारिए!!

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  10. माज़ी के सामानों में
    यादों का नायाब ख़ज़ाना पेश किया है आपने.
    बहुत अच्छी रचना है...बधाई.

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  11. मृदुला जी आपने तो एक पूरी ज़िन्दगी की यादें ताज़ा कर दी। बहुत भावमय और बेहतरीन रचना है। शुभकामनायें ।

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  12. माज़ी के इन सामानों से आपकी संवेदनशीलता झलकती है । बेहद खूबसूरत बिम्ब हैं ये ।

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  13. खूबसूरत अभिव्यक्ति , आभार

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  14. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  15. माज़ी के सामानों में,
    हमको भी
    रखे रहना...

    बहुत खूब ... किसी भी बहाने से ... पर वो याद रखें .... गहरे ज़ज्बात समेट कर लिखी रचना है ...

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  16. ah! dil choo gai :)

    http://liberalflorence.blogspot.com/

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  17. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति..... जज्बातों और अहसासों को समेटे एक संवेदनशील रचना.....

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  18. भावमय प्रस्‍तुति ।

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  19. बहुत ही सुंदर रचना !

    यादों को फिर से जीने का अपना ही मज़ा होता है ! कुछ यादें कडवी होती हैं कुछ यादें मीठी होती हैं, मगर फिर भी यादें तो यादें ही होती हैं ! बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति !
    शुभकामनायें ।

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  20. बहुत सुन्दर कविता...बधाई.

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  21. हाँ कुछ चीजें हमेशा सहेजने लायक होती हैं बेशक दूसरों के लिये उनका कोई मोल ना हो………………बेहतरीन अभिव्यक्ति।

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  22. सबसे पहले हमारी बात- सच कहें तो एकबारगी तो यकीं ही नहीं हुआ कि बी.टेक करने वाली किसी लड़की ने इसे लिखा है। क्‍या खूब लिखा है आपने। हमने आज पहली बार सयोगवश आपके ब्‍लॉग पर आए और आपकी एक ही रचना पढ़ आपकी प्रतिभा के मुरीद हो गए। लो, आज से ही हमने आपको फॉलो किया। अब आपकी हर रचना पढ़ेंगे।
    अब आपकी रचना के बारे में- आपकी रचना पढ़के कोई आपको माजी के सामानों से अलग नहीं करेगा। करे भी तो आप नहीं हो सकती। धन्‍यवाद इतनी अच्‍छी रचना के लिए।

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  23. एक बार फिर पढ़ी, इसलिए एक बार और कमेंट- अति सुंदर रचना।

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  24. http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/19-297.html

    यहाँ भी आयें .

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  25. bahut hi sunder rachna ..... shubhkaamnaein..

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  26. बहुत भावपूर्ण..

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  27. मृदुला जी कुछ तकनीकी खराबी के कारण टिप्पणी ठीक से नही आ पाई । उसे फिर से पढें--भावनाओं के धागे में स्मृतियों के खूबसूरत मोती पिरोये हैं आपने । आपकी दोनों कविताएं पढी अभिव्यक्ति में एक ताजगी है ।

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  28. ...सीपी ,किताबों , तितली,कागज़ के पुलिंदों, डोरी , कलम,टिकिया ,फटेपन्ने,तारीख़,सिक्का,पर्चियों ,चिट्ठियों ,
    अंगूठियों ,नगीना,हुक्के की टोंटी ,गुडगुडी .पॉकेट घडी ,चेनों ,
    नुस्खा दवाईयों का,
    दावात ,सुई,बटुआ,झोले,डंडा, तिरंगा,चाभियों का
    गुच्छा, मोती,
    धागों की
    पोटली,चुम्बक...
    itni sari wastuwen mahaj ek kavita main sama gaye ?.............
    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति !
    शुभकामनायें ।

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  29. एक भावपूर्ण, दिल को छु जाणे वाली रचना!!!

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  30. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  31. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया .............माफी चाहता हूँ..

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