कई बार दूसरों के भोगे गए यथार्थ को हम, अपने शब्दों का जामा पहना देते हैं.........उसीका एक उदहारण आप सब के सामने प्रस्तुत है......
बाबा,
तुम कहाँ चले गए......
खेलने की उम्र में
मुझे
बिलखता छोड़कर.
काश तुम देख सकते,
तुम्हारा
वह असहाय पुत्र,
आत्म-बल से
बाधाएँ
पार करता हुआ,
अपने पैरों पर
खड़ा
हो गया है.
काश तुम देख सकते,
तुम्हारे
पुत्र के सशक्त
कंधे,
घर-संसार चलाने में
सक्छम
हो गए हैं,
उसकी हथेलियों में
खुशियाँ
भरने लगी हैं,
काश तुम देख सकते,
तुम्हारे घर की
चौखट को,
तुम्हारी पुत्रवधू ने,
आलता-दूध में
पांव रखकर,
पार कर लिया है
और मैं सोचता हूँ.....
तुम
कितने खुश होते,
काश तुम देख सकते .