तुम्हारे साथ बीते वे पल ....
मैं कहती उन्हें
ठंढी हवा का
एक झोंका..अगर
जेठ की
दुपहरी होती
पर अगहन-पूस की
शाम में,
ठंढी हवा
शीत-लहरी होती है,
राहत नहीं पहुँचाती
सूई सी
चुभोती है..इसीलिए
बदलनी होगी
पुरानी मान्यतायें,
पुरानी कल्पनायें
और
कहना होगा..
तुम्हारे साथ बीते वे पल.......
जैसे हल्की सी
आहट हो
गर्म-गर्म हवा की,
दिल-ओ-दिमाग को
सुकून सी पहुँचाती हो.
मैं कहती उन्हें
ठंढी हवा का
एक झोंका..अगर
जेठ की
दुपहरी होती
पर अगहन-पूस की
शाम में,
ठंढी हवा
शीत-लहरी होती है,
राहत नहीं पहुँचाती
सूई सी
चुभोती है..इसीलिए
बदलनी होगी
पुरानी मान्यतायें,
पुरानी कल्पनायें
और
कहना होगा..
तुम्हारे साथ बीते वे पल.......
जैसे हल्की सी
आहट हो
गर्म-गर्म हवा की,
दिल-ओ-दिमाग को
सुकून सी पहुँचाती हो.