Monday, January 14, 2013

तुम्हारे साथ बीते वे पल ....

तुम्हारे साथ बीते वे पल ....
मैं कहती उन्हें
ठंढी हवा का
एक झोंका..अगर
जेठ की
दुपहरी होती
पर अगहन-पूस की
शाम में,
ठंढी हवा
शीत-लहरी होती है,
राहत  नहीं पहुँचाती
सूई सी
चुभोती है..इसीलिए
बदलनी होगी
पुरानी मान्यतायें,
पुरानी कल्पनायें
और
कहना होगा..
तुम्हारे साथ बीते वे पल.......
जैसे हल्की सी
आहट हो
गर्म-गर्म हवा की,
दिल-ओ-दिमाग को
सुकून सी पहुँचाती हो.

Sunday, December 30, 2012

रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में......

रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में
जब ढूँढने लगी
खुशियाँ
तो लगा......
खुशियों की कोई
कीमत नहीं होती,
रद्दी से मिले
एक सौ अस्सी रूपये में
खुशी  होती है,
मटर पच्चीस से बीस का
किलो
हो जाये
खुशी होती है,
'स्वीपर','माली''मेड '
'ड्राइवर'
समय से आयें
खुशी होती है,
आलू के पराठे पर
'बटर'
पिघल जाये
खुशी  होती है,
चक्कर लगा घर के
कोने-कोने में
खुशी होती है,
'बुक-सेल्फ' से निकालकर
किताब
पढ़ने में
खुशी होती है,
पर्दे सही लग जाएँ
खुशी होती है,
'टेबल-क्लौथ'  धुल जाएँ
खुशी होती है........तो
रोज़
बड़ी-बड़ी खुशियाँ
कहाँ मिलने वाली.....
चलो,इसी में
जी लिया जाये,
जाड़े का मौसम है
क्यों न
एक 'कप' गर्म चाय का
आनंद लिया जाये.








Thursday, December 27, 2012

कहते हैं माँ-बाप आजकल......

कहते हैं माँ-बाप आजकल......
बड़े होशियार हैं
मेरे बच्चे,
सारे 'पोयम्स' याद हैं इन्हें 
'बाई -हार्ट',
'चैम्पियन'हैं 'स्विमिंग' के,
हर बार 'फर्स्ट' आते हैं
'क्लास' में.
'गिटार' बजाते हैं,
'पियानो' बजाते हैं ,
करते हैं
'घुड़सवारी',
छोटी सी उम्र में
शौक रखते हैं 'ब्रिज' का
'शतरंज' का
खेल लेते हैं, खेल
सारी.
नहीं करते वे
इन बातों का ज़िक्र........
घूमते रहते हैं
नंगे पाँव, इधर-उधर
अंदर-बाहर,
जबाब देते हैं
हर बात का,
बदतमीजी से,
उधम मचाकर ,ऊपर की
मंजिल पर,
जीना मुश्किल
कर देते हैं
नीचे वालों का.
दूसरों के घर जाकर,
तोड़-फोड़ मचाकर,
कभी हर चीज छूकर
कभी पानी
गिराकर,
कर देते हैं- नाक में दम,
जहाँ कहीं जाते हैं,
घर में जो
छूने  की मनाही हो,
बाहर
उन्हें ही आज़माते हैं.
यह सब देखकर
माँ -बाप को आता है
लाड़,
रहने दो बच्चों,
प्यार से
थपथपाते हैं.
नहीं समझते औरों की
कसमसाहट
जब नई बिछी
कालीन पर,
बच्चे चाय छलकाते हैं,
वे समझते हैं
ये सारी खुराफ़ातें
बच्चों की होशियारी में,
चार चाँद लगाते  हैं.



 



Saturday, December 15, 2012

जाड़ों की सुबह-सुबह........

जाड़ों की सुबह-सुबह
सरकाकर सारे पर्दों को,
खोलती हूँ
दरवाज़ा जो.......
मखमली धूप
खिड़की की छड़ों से
छनकर,
हमारी दहलीज को
पारकर,
कमरे की हर चीज़ को
छूने का प्रयास
करती हुई,
छू लेती है........
बिखेड़ती हुई,
अपनी गरिमामय
मुस्कुराहट
कोने-कोने में.......
इस सुनहले स्पर्श के
सम्मोहन से
खिल उठता  है
मन-प्राण
और
आत्मसात कर लेती हूँ
इस छुअन को,
अगली सुबह तक के लिये.



Saturday, October 27, 2012


शीत का प्रथम स्वर.........

प्रत्युष  का  स्नेहिल स्पर्श  
पाते ही,
हरसिंगार  के  निंदियाये फूल,  
झरने  लगते  हैं  
मुंह  अँधेरे,
वन-उपवन  की
अंजलियों  में
ओस से नहाया हुआ
सुवास,
करने  लगता  है  
अठखेलियाँ  
आह्लाद की,
पत्तों  की सरसराहट  
रस-वद्ध  रागिनी  
बनकर,
समा जाती  हैं  
दूर  तक .......
हवाओं  में,
गुनगुनी  सी  धूप
आसमान  से उतरकर 
कुहासे  को  बेधती  हुई
बुनने  लगती  है  
किरणों  के  जाल,
तितलियाँ पंखों पर 
अक्षत, चन्दन,रोली  लिए  
करती  हैं  द्वारचार  
और  
धरती,
मुखर  मुस्कान  की 
थिरकन  पर 
झूमती  हुई,  
स्वागत  करती  है........
शीत  के  
प्रथम  स्वर  का.
  

Friday, October 19, 2012

पूजो एलो, चोलो मेला......

अपने 'ग्रैंड-सन' के लिए पहली बार बँगला में लिखने की कोशिश की है.......लिपि देवनागरी ही रखी हूँ जिससे ज़्यादा लोग पढ़ सकें......आपकी प्रतिक्रिया पता नहीं क्या होगी.....जो भी हो,सर आँखों पर.......


पूजो एलो, चोलो मेला,
हेटे-हेटे जाई,
नतून जामा,नतून कापोड़,
नतून जूतो चाई.
बाबा एनो रोशोगोला,
मिष्टी दोईर हांड़ी,
माँ गो तुमि
शेजे-गूजे,
पोड़ो ढ़ाकाई शाड़ी.
आजके कोरो देशेर खाबा,
शुक्तो,बेगुन भाजा,
गोरोम-गोरोम भातेर ओपोर,
गावार घी दाव
ताजा.
चोलो 'शेनेमा'
'पॉपकॉर्न' खाबो, खाबो
आइस-क्रीम,
आजके किशेर ताड़ा एतो
कालके छूटीर दिन.
रात्रे खाबो 'चिली' 'चिकेन',
भेटकी माछेर
'फ्राई',
ऐई पांडाले,ओई पांडाले,
होई-चोई
कोरे आई.



Sunday, October 14, 2012

कभी बाल सूर्य देखा है क्या ?

बड़े-बड़े शहरों में 'सूर्योदय' का मनोरम  दृश्य दुर्लभ हो गया है.ऊँची-ऊँची इमारतों के पीछे  सूर्य के बाल  रूप की छठा छिप जाती है.इसी भाव पर ये कविता है ........

कभी बाल सूर्य
देखा है क्या ?
हर रोज़ क्षितिज  के
कोने में,
पौ फटते ही,
एक लाल-लाल
गोला-गोला,
चपटा-चपटा
थाली जैसा,
देखा है क्या?
कभी बाल लाल की
स्निग्ध प्रभा
क्रीड़ा-कौतुक,
कभी बाल लाल की
रत्न-जटित
जो स्वर्ण मुकुट,
कभी बाल लाल
शीतल प्रकाश का
रंग-जाल,
कभी बाल लाल के
मस्तक का
हँसता गुलाल,
कभी बाल लाल का
सम्मोहन
जादू विशाल,
कभी बाल लाल की
रूप छठा से
मुदित भाल,
कभी बाल लाल का
मेघ-माल,
कभी बाल लाल की
तेज़ चाल,
हर रोज़ क्षितिज के    
कोने में,
पौ फटते ही,
एक लाल-लाल
गोला-गोला,
चपटा-चपटा
थाली जैसा,
देखा है क्या?
कभी बाल सूर्य
देखा है क्या ?