Sunday, November 3, 2013

This book will be an indispensible read for students and scholars of political science and will also be of interest to general readers.

When the Saints Go Marching In’: The Curious Ambivalence of Religious Sadhus in Recent Politics in India 
Rajesh Pradhan

Price : 695.00
ISBN : 978-81-250-5269-2
Pages : 324
Binding : Hardback
Book Size : 140 x 216 mm
Year : 2013
Territorial Rights : World

Monday, October 28, 2013

ज़माना चाहे जितना भी बदल गया हो,लोग-बाग कितने भी 'मॉडर्न' हो गये हों .......लेकिन शादी के बाद, बेटी के विदाई की भावुक कर देनेवाली नाज़ुक घड़ियाँ, जस-की-तस हैं.......वे कभी नहीं बदलेंगी......इसी भाव पर आधारित है ये कविता.......

दर्द का एक दौड़ सा
मन में समाता 
जा रहा है.....और पलकें 
इन दिनों,
तुमसे बिछड़ने की 
करुण सी वेदना में,
भींगने जब-तब लगी है.......
काँपता,नींदों में मन 
और धड़कनें
बढ़ने लगीं हैं,
विदा की घड़ियाँ
सिमटकर
अब हमें....छूने लगी हैं,
मन व्यथित-व्याकुल
समंदर में
लिपटता जा रहा है,
विदा का बादल उमड़
चारो दिशा
मंडरा रहा है.....
इन दिनों तुमसे विलग
होने की
निर्मम कल्पना,
प्रति-पल
विकल करने लगी है.....
और.....आँखों में उदासी
पिघलने
जब-तब लगी है.......

Monday, October 7, 2013

सांस लेता हूँ तो
लिख देती हो 
तुम,
मुस्कुराता हूँ तो  
लिख देती हो 
तुम,
लूं जम्हाई सामने 
ग़ल्ती से जो,
छींक भी आये तो 
लिख देती हो 
तुम.
मैं जगूं,बैठूँ ,
पियूँ ,खाऊँ कि सोऊँ,
चुप रहूँ ,
लिखूँ,पढूँ,
बोलूँ न बोलूँ 
घोलकर स्याही
खड़ी रहती हो 
तुम,
बात कोई हो न हो 
बेबात लिख देती हो 
तुम,
सांस लेता हूँ तो 
लिख देती हो 
तुम.......     

Tuesday, September 24, 2013

नमन उन्हें शत बार......

दिनकर जी के बारे में
जितना लिख दूं
वह कम है,
'रश्मिरथी','कुरुछेत्र'
पढ़ी थी,
अब तक आँखें
नम हैं.
जन-जीवन,ग्रामीण ,
सहज,
कितना गहरा 
स्वाध्याय,
दिए अमूल्य ,अतुल
वैभव
'संस्कृति के चार अध्याय '.
'हारे को हरिनाम ',
'उर्वशी '
पढ़कर नहीं अघाते,
श्रोता हों या वक्ता हों,
हर पंक्ति को
दोहराते.
संसद में रहकर भी
सत्ता,
जिनको नहीं लुभाया,
दिनकर जी को मिला,
पढ़ा जो,
अब तक नहीं
भुलाया.
कृतियों का प्रज्ज्वल प्रकाश,
उत्कर्ष,
कलम का थामे ,
भारत की
गौरव-गाथा में,
राष्ट्र-कवि हैं आगे.
ऋणी रहेगा 'ज्ञानपीठ',
हिंदी का नभ
सम्मानित,
नमन उन्हें शत बार
ह्रदय यह,
बार-बार गौरवान्वित .
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Tuesday, September 17, 2013

1981से 1986 तक .......

1981से 1986 तक सूडान में रहे. वहाँ के लोग अधिकतर अरबी भाषा बोलते थे.इंगलिश भी बहुत कम समझते थे.....तो 'इंगलिश-अरेबिक' किताब पढ़कर बड़ी मेहनत से अरबी शब्द ढूँढती थी,याद करती थी और छोटे-छोटे ,टूटे-फूटे वाक्य बनाती थी.....लेकिन फल ये मिलता था कि कंठस्त वाक्य किसीसे कह तो देती थी पर जो जबाब आता था......कुछ भी नहीं समझते थे.फिर भी एक-दो साल बाद इतना तो आ गया था कि नौकर को डांट सकूँ. नौकर से याद आया.जो मेरे यहाँ काम करता था,उसका नाम 'मूसा' था.एक दिन मुझसे बोला कि मुझे कल छुट्टी चाहिये. मेरे पूछने पर कि क्या काम है,बताया कि कल मेरे पिता की सातवीं शादी है और मुझे गवाह बनना है.( ये सारा सवाल-जबाब अरबी भाष में हो रहा था.....सोचिये मैं कितना ज्यादा सीख गयी थी)  अभी मैं उसकी बात से पूरी तरह संभल भी नहीं पायी थी कि एकाएक पूछ बैठा, मदाम....आपकी कितनी मम्मी है? इस परिस्थिति से सप्रयास खुद को निकालकर इतना ही बोल पायी.....वाहिद.चौंक गया 'मूसा'.....एक मम्मी वाली बात उसे बेहद अस्वाभाविक लग रही थी लेकिन मैं इस विषय पर और कोई बात करना नहीं चाहती थी सो वहीँ पर रोक दी इस बात को.इंडिया आने पर अम्मा को बताये.....हँसते-हँसते सबका बुरा हाल था.

Monday, September 16, 2013

1965 के ज़माने में ......

1965 के ज़माने में शादी के बाद बहु का घर-गृहस्थी जमाने के लिये ,घर की बड़ी-बूढ़ी साथ जाया करती थीं.....सो मेरी सास भी 'सिलिगुड़ी' आ गयीं.नौकर की सहायता से घर सँभालने लगीं.खाली समय में आँख बंद कर 'साधन' करती थीं या माला फेरती थीं.वो छुआ-छूत मानने के कारण चावल-दाल-रोटी खुद बनाती थीं.इसके अलावा भी विभिन्न प्रकार का भोजन बनाने का उन्हें बेहद शौख था.तब पत्थर के कोयले का चूल्हा होता था,जैसे ही आँच धीमी होती थी ऊपर से और कोयला डालना पड़ता था और लोहे की चिमटी से नीचे की बुझी राख को झाड़ना पड़ता था.खैर! तो होता ये था कि बारह बजे तक सारा खाना बनाकर,चूल्हे पर दाल चढ़ा देती थीं हालाँकि तब तक 
'प्रेशर-कुकर' का अविष्कार हो चूका था लेकिन 'प्रेशर-कुकर' के अंदर रबड़ लगा है यह कहकर वो 'कुकर' का इस्तेमाल नहीं करती थीं.बहरहाल चूल्हे पर पतीले में दाल चढ़ जाता था.अब देखिये,मुझसे कहती थीं......तुम दाल देख लेना. अब बताइये सत्रह साल की बच्ची यानि मैं जिसने कभी हाथ से डालकर पानी भी नहीं पीया हो वो दाल क्या देखेगी......क्या समझेगी....तो होता ये था कि मुझे भी नींद आ जाती थी और आँख खुलने पर जब तक रसोई में पहुँचती थी,सारी दाल उफनकर,कुछ चूल्हे पर और कुछ ज़मीन पर फैल चुकी होती थी.दाल का पानी गिर जाने के कारण चूल्हा बुझ जाता था,दाल कच्ची रह जाती थी.....अगर चूल्हा नहीं बुझता था तो दाल जल जाती थी यानि किसी भी हालत में खाने में दाल नहीं रहता था.....लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्य मुझे तब होता था जब दाल की इस दुर्घटना पर मेरी सास कभी कोई शिकायत नहीं करती थीं और नये सिरे से हर रोज़ मुझसे कहती थीं कि दाल को जरा देख लेना.उधर मेरे पति,एक-डेढ़ बजे के करीब ऑफिस से लंच खाने के लिये घर आते थे.यहाँ हर रोज दाल का नया किस्सा लेकिन कभी भी उनके चेहरे पर,उनकी बातों में दाल को लेकर कोई समस्या नहीं दिखती थी.एकदम खुशी-खुशी जो खाना बना रहता था,खाकर 'ऑफिस' चले जाते थे.पता नहीं बार-बार यह प्रक्रिया दोहराये जाने के बाबजूद उन लोगों को मुझपर गुस्सा क्यों नहीं आता था.......कितना धैर्य था उनमें,सोचकर आज भी आश्चर्य होता है.......

अम्मा बाज़ार नहीं जाती थीं......

अम्मा बाज़ार नहीं जाती थीं.....त्योहारों पर बाबुजी थाक-पर थाक साड़ी लेकर घर आते थे और घर ही में पसंद की साड़ी चुनती थीं......क्या ज़माना था.